ज़िंदगी ना जाने कहाँ पीछे छूट गयी

28 मार्च 2018   |  Karan Singh Sagar ( डा. करन सिंह सागर)   (78 बार पढ़ा जा चुका है)

ख़्वाहिशों के पीछे दौड़ते दौड़ते
ज़िंदगी ना जाने कहाँ पीछे छूट गयी
पता ही ना चला
शिखर तक पहुँचने की चाह में
ज़िंदगी ना जाने कब,
हाथों से फिसल गयी, पता ही ना चला
उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश में
अपनी उम्मीदों ने, कब ज़िंदगी का साथ छोड़ दिया
पता ही ना चला
सबके ख़्वाबों को संजोते संजोते
ज़िंदगी ने कब ख़्वाब देखना बंद कर दिया
पता ही ना चला
दुनिया के रंग में ढलने के चाह में
ज़िंदगी ना जाने कब बेरंग हो गयी
पता ही ना चला

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