"दोहा"

09 अप्रैल 2018   |  महातम मिश्रा   (38 बार पढ़ा जा चुका है)

"दोहा"


हरिहर तुम बिन कौन अब हरे जगत की पीर

मंशा मानस पातकी शीतल करो समीर।।-१


प्रभु आया तुम्हरी शरण तुम हो तारणहार

तन मन धन अर्पण करूँ हे जग पालनहार।।-२


सुख संपति सुंदर भवन निर्मल हो व्यवहार

घात हटे घट-घट घृणा घटना हटे कुठार।।-३


मूरख मनवा हरि बिना भरे न भव्य विचार

कामधेनु बिन बाछड़ा महिमा अपरम्पार।।-४


पारिजात हरि बिनु कहाँ ऊसर कहाँ अनार

रजनीगंधा रात की दिन में कहाँ अन्हार।।-५


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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