अपनी ही दुनियां

17 अप्रैल 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (72 बार पढ़ा जा चुका है)



शान्त चेहरे की अपनी होती एक कहानी

पर दिलके अंदरहोते जज्बातों के तूफान,अंदर ही अंदर बंबद किताब के पन्ने

पनीलीऑंखों से अनगिनत सपने झाकते ,

जीवनका हर लम्हा तितर बितर,जीवन का अर्थ समझ नही आता, भावहीन सी सोचती,खुद को साबित करने को उउतावली , पूछती अपने आप से,

सपने तो ककई है, पर है कौन सा सपना अधूरा, आज बहुत से सवाल है, दिमाग को झकझोरते, खुद से सवाल, जबाव मागे रहे, जीवन को कोई तो नई दिशा मिले, जुवान रोक सकता है जमाना, पर, सपने देखने से कौन रोक पाया, अपने ही सपनों मे ही, दुनिया की कल्पना करती, खुश हो लेती ........

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