मैं अपने आप को कही भूल आया हु

06 मई 2018   |  vikas khandelwal   (88 बार पढ़ा जा चुका है)

मंज़िल से भटक गया हु



प्यार कि राहो मे जो आ गया हु



ऐसा लगता कि काबा काशी हो आया हु


तेरे पहलू मे जो आ गया हु


मुझे उनके घर ना ढूंढें कोई



मैं तो उनके दिल मे रहने लगा हु



कभी उनकी धड़कनो से खेल ता हु



कभी उनके होठो पे मुस्कान बनके सजने लगा हु



कभी ख़्वाब बनके उनकी आँखों मे रहने लगा हु



अब तो मुकदर पे अपने मुस्कुराने लगा हु



उनके इतना क़रीब रहने लगा हु



कि ख़ुद से हि आजकल दूर हो गया हु

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