फिर एक दिन...

26 मार्च 2015   |  ओम प्रकाश शर्मा   (338 बार पढ़ा जा चुका है)

फिर एक दिन...

एक गिरी-पड़ी झोपड़ी में
रहती थी वो,
सब बुढ़िया कहके
बुलाते थे उसे,
अलग-अलग आवाज़ों में
बुढ़िया तो थी ही,
सूखे अस्थि-पिंजर में
लिपटी, चलती-फिरती काया.
उसके ही जैसी सूखी
लाठी पर टिकी हुयी.
गालों की सुर्ख़ियों से
चेहरे की झुर्रियों का सफर
तय किया था उसने
उसी कच्ची झोपडी में.
एक रोज़ सुना उसका,
जवान बेटा गया था
फ़ौज में.
ये कहकर कि जल्द लौटेगा.
कई बरस बीत गए
पर नहीं आया.
सुध-बुध खो बैठी थी
अब तक बेचारी
जिह्वा पर एक बात
रटे थी, रात-दिन
सो रटे जाती थी
कि मेरा लाल आएगा
वो झूठ तो कभी बोला नहीं
कहा है तो आएगा
सब जानते थे कि
बेटा शहीद हो गया होगा
तभी नहीं आया
इतने बरस नहीं आया
तो अब क्या आएगा.
तभी एक रात,
किवाड़ खटखटाये किसी ने,
बुढ़िया उठी, किवाड़ खोले,
उसका लाल
सामने खड़ा था.
तब बेटा खो गया था
और आज शब्द.
लोग बहुत जानते थे
मगर सब ग़लत,
बुढ़िया, सुध-बुध खोकर भी
जानती थी कि आएगा
उसका लाल लौटकर
वो ठीक जानती थी.

-ओम प्रकाश शर्मा










अगला लेख: 'शब्दनगरी' को बहुत-बहुत धन्यवाद...



माँ का ह्रदय ऐंसा ही होता है।

धन्यवाद, योगिता जी !

दिल को छु गयी... सुन्दर रचना

उषा यादव
19 सितम्बर 2015

अत्यंत भावपूर्ण !

अर्चना गंगवार
12 सितम्बर 2015

बुढ़िया, सुध-बुध खोकर भी
जानती थी कि आएगा
उसका लाल लौटकर
वो ठीक जानती थी.

देश के रखवालों के परिवारजनों की दशा का अच्छा वर्णन है इस रचना में शर्माजी

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
23 मार्च 2015
टे
यूँ तो भारत की सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान और विज्ञानं के संगम के लिए कभी भी किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं रही है. ये वो देश है जहाँ धर्म के पावन उत्सव देखते ही देखते महाकुम्भ के मेले में परिणित हो जाते हैं. आई.आई.टी. जैसे अति विशिष्ट ज्ञान-विज्ञानं के इतिहास को जीवंत बनाये रखने वाले निश्छल मन-मस्तिष्क
23 मार्च 2015
20 मार्च 2015
शा
ये सच है कि कलाकार स्वतंत्रता की ज़मीन पर ही काम करता है उसके विचारों कि स्वतंत्रता ही उसकी वो जादुई तूलिका होती है जिसके माध्यम से वो अनेकानेक रचनाओं में रंग भरता है. कलाकार स्वतंत्र नहीं होगा तो किसी भी नयी रचना की सम्भावना भी नहीं रहेगी. विचारों कि जितनी स्वतंत्रता होती है, कल्पना कि उड़ान भी उतनी
20 मार्च 2015
24 मार्च 2015
'
आजकल शहर की मलयसमीरों में एक अजब सी सुगंध बह रही है और अगर आप इस सुगंध का नाम जानने की जिज्ञासा से सराबोर हैं तो आपको बता दें इस सुगंध का नाम है 'टेककृति-२०१५'. केवल आई.आई.टी. संस्थान ही नहीं बल्कि पूरे शहर में इस कार्यक्रम की धूम मची हुई है. पूरा संस्थान विभिन्न कृतियों, टेककृतियो, रचनाओ-ऋचाओं, रंग
24 मार्च 2015
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x