पचपन का यौवन (हास्य)

10 मई 2018   |  प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा   (57 बार पढ़ा जा चुका है)

पचपन का यौवन

दाढ़ी जब से सफ़ेद है मेरी ,

हुस्न वालों ने आँख है फेरी ....


कैसे बतलाऊं इनको, कैसा हूँ ,

यारों ! मैं नारियल के जैसा हूँ ...


हाथ में ले के मुझको तोड़ो तो !

मेरे अन्दर गिरी को फोड़ो तो !


कितना समझाया इन हसीनों को ,

ठीक करता हूँ मैं मशीनों को ....


एक बोइंग सा हाल है मेरा ,

दिल अभी भी कमाल है मेरा ....


उम्र थोड़ी सी ढल गयी तो क्या ?

मेरी नीयत फिसल गयी तो क्या ?


इतने अरमां मेरी कहानी में,

खत्म ना हो सके जवानी में ...


हाय आईने ! कुछ रहम कर दे,

कुछ जवानी के हम पे रंग भर दे...


आँखों में रोशनी समा जाए ,

कोई नूरानी चेहरा आ जाए ....


जब हसीं सामने से चलते हैं,

मेरे अरमान फिर मचलते हैं....


दिल ज़रा जोर से धड़कता है,

ताक़तों का जुनूं फड़कता है.....

देखता आँख मैं गड़ा करके ,

आँख पर चश्मे को चढ़ा करके....


वह भी नज़दीक मेरे आते हैं ,

हाय चचा ! कह के चले जाते हैं ....


बेरुखी, दिल नहीं सह पायेगा ,

इतना धड़केगा, गुज़र जाएगा ....


मेरे मौला ! ये क्या सज़ा दी है ,

बूढ़े शोलों में फिर हवा दी है ....


इल्तजा मेरी भी ज़रा सुन ले !

एक हसीना मेरे लिए चुन ले ...


ज़ायका उसका शायरा रखना

उम्र पचपन का दायरा रखना...


गर नयी कोई ना हो खोली में,

उम्र वाली ही देदे झोली में...


मेरे मालिक ! जादुई छड़ी को हिला ,

मेरे को एक छप्पन छुरी तो दिला ....

..... ...................................................प्राणेंद्र नाथ मिश्र

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