क्या नमाज़ इतनी ज़रूरी है कि अपनी ही बच्ची को मार डाला जाए!

14 मई 2018   |  प्राची सिंह   (126 बार पढ़ा जा चुका है)

क्या नमाज़ इतनी ज़रूरी है कि अपनी ही बच्ची को मार डाला जाए!

इससे पहले कि मैं अपना आक्रोश ज़ाहिर करूं, आप घटना जान लीजिए.


मुंबई के एंटॉप हिल इलाके में एक 15 साल की नाबालिग़ बच्ची को मार दिया गया है. वजह सिर्फ इतनी थी कि उसने जुमे की नमाज़ नहीं पढ़ी थी. मारने वाले उसके ही रिश्तेदार थे. उसकी सगी मामी ही थी, जिसने दुपट्टे से गला घोंटकर उसे मार डाला. इन लोगों ने अपना गुनाह छिपाने के लिए पुलिस को गुमराह करने की भी कोशिश की. बताया कि बाथरूम में गिरने से लड़की की मौत हुई है. पर जब पोस्टमार्टम हुआ तो हकीकत सामने आ गई. पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया है. इनमें से दो लड़की की मामियां हैं. एक का नाम है शबीरा, दूसरी का सौलिया. तीसरी गिरफ्तारी सौलिया की बेटी की हुई है जो खुद भी नाबालिग़ है. मरने वाली लड़की का नाम मिनाज़ बताया जा रहा है.


प्रतीकात्मक इमेज.
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लड़की की मां नहीं थी. पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से वो अपने मामा के यहां रहती थी. बीते शुक्रवार जब बार-बार कहने के बाद भी लड़की ने जुमे की नमाज़ नहीं पढ़ी, गुस्साई मामी ने उसके गले में फंदा डालकर उसकी जान ले ली. इस हौलनाक हादसे ने लड़की के पिता को तोड़कर रख दिया है. ख़बर मिलने के बाद से ही वो सदमे में हैं. पछता रहे हैं कि आखिर क्यों उन्होंने अपनी बेटी को रिश्तेदारों के पास छोड़ा था. पिता का ये आर्तनाद किसी भी संवेदनशील इंसान को हिला देगा कि वो अगर नमाज़ नहीं पढ़ती थी तो मेरे पास भेज देते. बोल देते कि नमाज़ पढ़ना सिखा दो.


ये घटना हमें महसूस करवाती है कि सभ्य समाज होने का जो हमारा दावा है, वो कितना खोखला है. भले ही हम पाषाण युग को बहुत पीछे छोड़ आए हो, पत्थर के अंश हमारे अंदर अब भी हैं. कई बार तो हम खुद ही पत्थर बन जाते है. जिसपर सिर पटक-पटक कर मानवता दम तोड़ देती है. धर्म का जब जन्म हुआ था, तो उसने एक काम ठीक किया था. लोगों के लिए नैतिकता के कुछ पैमाने सेट किए थे. जिनकी वजह से किसी की जान लेना, किसी का बुरा करना वगैरह चीज़ें बुरी मानने की प्रैक्टिस बन गई. धर्म अपने साथ बुराइयां भी लाया था लेकिन वो किस्सा फिर कभी. सदियां बदलती रहीं और मनुष्य प्रगतिशीलता की सीढियां चढ़ता गया. लेकिन कुछ लोग मज़हब में इतना अंदर घुस गए कि ईश्वर से ज़्यादा उसके नाम पर चलने वाली रूढ़ियों, रीति-रिवाजों को ही सर्वोपरि मान बैठे.


प्रतीकात्मक इमेज.
प्रतीकात्मक इमेज.

माना कि इस्लाम में नमाज़ पाबंदी से पढ़ने की हिदायत है. बल्कि इस्लाम जिस एक चीज़ पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देता है, वो नमाज़ ही है. लेकिन वही इस्लाम, वही कुरआन ये भी सिखाता है कि किसी इंसान की जान लेना सबसे घटिया काम है. कुरआन की एक आयत में साफ़ लिखा हुआ है कि अगर एक भी बेगुनाह की जान ली तो समझ लो सारी इंसानियत का क़त्ल कर दिया. नमाज़ की अदायगी के लिए मरी जा रही उन मोहतरमा ने काश कुरआन की ये आयत ही ठीक से पढ़ ली होती. तो अपनी ही बच्ची की जान लेने जैसा क़बीरा गुनाह करने से बाज़ आ जाती. क्या किसी भी खुदा को ये मंज़ूर होगा कि उसके नाम पर किसी भी तरह की खूंरेजी हो? उस बच्ची को जीने का हक़ था. भले ही वो तमाम उम्र मुसल्ले पर पैर न धरती. उसका खुदा और उसके बीच की बात थी. दोनों आपस में देख लेते. किसी को भी हक़ नहीं कि वो किसी इंसान की ज़िंदगी पर फुलस्टॉप लगा दें. भले ही फिर वो मामी हो या मां.


मज़हबों की ऐसी ही मूर्खताओं से तंग आकर ही फ़िराक गोरखपुरी साहब ने कहा होगा,

“मज़हब कोई लौटा लें, और उसकी जगह दे दें
तहज़ीब सलीके की, इंसान करीने के”

Minor girl strangled to death by her own aunt after she refused to offer friday namaz

https://www.thelallantop.com/bherant/minor-girl-strangled-to-death-by-her-own-aunt-after-she-refused-to-offer-friday-namaz/

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