प्यार का मुझपे से जरा बुखार उतर जाने दो

21 मई 2018   |  vikas khandelwal   (87 बार पढ़ा जा चुका है)

प्यार का मुझपे से जरा बुखार उतर जाने दो



बारिश कि कुछ बुँदे मुझपे जरा गिर जाने दो



दिल के हालत जरा संभल जाने दो



फिर आना तुम मेरे अंगना



पहले आदमी को आदमी जरा बन जाने दो



तुम क्या जानो पीर पराई



तुम क्या जानो प्रियतम कि याद में आँखे कितना रोई



है ये मोहबत कि रुस्वाई



जो जीवन मे तन्हाई पाई



कोई भी आकर नहीं कर सकता भरपाई



साजन चले जाना छुड़ा के दामन लेकिन



पहले मुझे आदत तन्हा जीने कि जरा पड़ जाने दो



प्यार का मुझपे से जरा बुखार उतर जाने दो



बारिश कि कुछ बुँदे मुझपे जरा गिर जाने दो



सुलगता बदन जरा बुझ जाने दो



प्यार का मुझपे से जरा.............!


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