जिन्दगी क्या?????एक हलवाई की दूकान...

21 मई 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (83 बार पढ़ा जा चुका है)

इस मायावी दुनिया में भाँती -भांति के लोग,

सबकी अपनी जिन्दगी,कोई अदरक तो कोई सोंठ,

किसी की जगह आलू जैसी,तो कोई थाली का बैगन,

अहमियत होती सबकी अपनी,जैसे व्यंजन ों में नोन,

रसगुल्ले का रस-सा घोलती माँ की प्यारी लोरियां,

पेड़े पर छपी चन्द्र कलाएं जैसी बच्चों की ह्ठ् खेल ियाँ,

गुझियाँ -सा बंधा परिवार में बड़ों का अनुशासन,

वही रसमलाई का रिश्तों में घुलता अपनापन,

मुस्कान लाती चेहरे पर,बाते चटपटी समोसे जैसी दोस्त-यारों की,

उबली दाल जैसे नीरस जीवन में,रंगीन मसालों का तडका लगाती,

ढकोसले लोगो की लोलुपता में जलेबी की चाशनी टपकती,

मतलबियों कीबातें,टेडी-मंदी,गोल-गोल इमरती-सी,

सोनपापड़ी,गजक पट्टी -सा जीवन भर संघर्ष करते जाते,

फिर भी, 'ऊंची दुकान ,फीके पकवान-सा' जीवन जीते,

मिक्स दाल रूपी जीवन में , 'शुद्ध घी'का बघार लगा दिया,

फिर भी,'मोती चूर के लड्डू'की तरह जीवन बिखर गया,

जीवन के रस हैं - मीठा,नमकीन,खट्टा,तीखा,कडवा,

पंचरस मिश्रित स्वाद हैं,सबका 'अपनी-अपनी जिन्दगी का'

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