ज़िन्दगी

02 अप्रैल 2015   |  सुशील चन्द्र तिवारी   (79 बार पढ़ा जा चुका है)

ज़िन्दगी की शाम जैसे जैसे गहराती गई,


ज़िन्दगी के फलसफों की समझ भी आती गई ।


बचपना करते रहे हम बूढ़े हो जाने तलक,


फिर उन्हीं नादानियों की याद दोहराती गई ।


खेलता बेफ़िक्र बचपन झूमता यौवन चला,


बंधनों की कसमसाहट प्रोढ़ता खाती गई ।


उम्र के अवसान में देखा जो आँखें फाड़कर,


इक नई तस्वीर उभरी और धुँधलाती गई।


जब तलक महसूस कर पाये आग़ाज़ -ए-ज़िन्दगी ,


बेवफ़ा महबूब सी वो तब तलक जाती गई ।।

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