'सत्यमेव जयते'

03 अप्रैल 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (353 बार पढ़ा जा चुका है)

'सत्यमेव जयते'

ग़ुलामी से भी शर्मनाक है-दास होने की चेतना का नष्ट हो जाना. आज हम मानसिक और वैचारिक, दोनों स्तरों पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दिनों से भी अधिक जड़ता की स्थिति में पहुँच चुके हैं, वो इसलिए कि जिस देश में लोगों में झूठ को झूठ कहने का नैतिक साहस नष्ट हो जाए, सच को सच कहने की ताब भी नहीं रह जाती. यह हिन्दी नहीं, देश का दुर्भाग्य है कि तथाकथित स्वाधीनता की प्राप्ति के बाद सत्य सिर्फ राजभवनों की तख़्तियों में जड़े जाने की वस्तु रह गया और सत्य का मुँह 'सत्यमेव जयते ' की स्वर्ण-पट्टिकाओं से दाब दिया जा चुका है.

-साहित्यकार शैलेश मटियानी

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