दहेज प्रथा

05 अप्रैल 2015   |  निवेदिता चतुर्वेदी   (294 बार पढ़ा जा चुका है)

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आजकल नारियों पर इतना अत्याचार देखने को मिल रहा है कि कहा नहीं जा सकता।कहीं नारियां दहेज को लेकर झेल रही हैं तो कहीं कुछ और,लेकिन आज मैं विशेष रूप से दहेज़ पर ही लिखने पर मजबूर हूँ।
सरकार ने दहेज प्रथा को रोकने के लिए कई कनून चलाए।कहा गये वो कानून,वो बसएक दिन के लिए थे जिस दिन लागू की गई।आज इस दहेज की अग्नि में कितनी नारियाँ झुलस रही हैं ।है किसी की नजर,है किसी को पता।
पुरातन काल में ऐसा कहा जाता था ह जहां नारी की पुजा होती है वहीं। देव गण भी निवास करते हैं।परन्तु ऐसा जानते हुए भी नारी के साथ अन्याय और शोषण में कमी नहीं आया इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है हम पूर्णतः अपनी संस्कृति और सभ्यता का त्याग कर चुके हैं।जिसके चलते हमें नारी के अन्दर विद्यमान गुणों को समझने कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है । है कोई नारी के पीड़ा को समझने वाला जो भी है वो पीड़ा देने वाला ,समझने वाला नहीं।
अरे ये कैसे लोग भुल गये कि प्राचीन काल में भी देखा जाए तो हमारे समाज में नारियों की स्थिति पूरूषो से कहीं सुदृढ़ मानी जाती थी।एक ऐसा समय था कि नारी का स्थान पुरूषो इतना ऊंचा और पुज्यनीय था कि पिता के नाम के स्थान पर माता के नाम से ही पहचान कराई जाती थी।ये सभी बातें आज कहाँ विलुप्त हो गई कुछ पता नहीं । आज मैं दहेज लेने वालों से यही कहूंगी कि दहेज़ लेने से पहले एक बार अपनी भारतीय संस्कृति सभ्यता को झाक कर देख लें कि नारियों का क्या महत्व है क्या मान है क्या सम्मान है।
~~~~~~~~~~~~निवेदिता चतुर्वेदी।
---------------------१९-०१-२०१५
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सुन्दर एवं सार्थक लेख !

हौसला अफजाई के लिए धन्यबाद मनोज जी एवं शालिनी कौशिक जी

nivedita ji aapki abhivyakti v chinta jayaj hai lekin har aadmi ke apne tark hain jo beti ke mamle me alag aur bete ke mamle me alag ho jate hain aur yahi karan hai ki ye samasya mit nahi sakti .

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , समाज में फैली कुरीतियों का अच्छा चित्रण | आगे भी लिखती रहिये और सामाजिक चेतना का अलख जगाती रहिये | बहुत -बहुत शुक्रिया निवेदिता जी |

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