संकळप

05 जून 2018   |  पारुल   (117 बार पढ़ा जा चुका है)

आज हम ऐसे समाज में रह रहे है , जहां हम ये नही कह सकते की ये काम मुझे से नहीं हो पायेगा | सिर्फ हम लोगो लोगों को एक संकल्प लेके चलना पङेगा की कुछ भी हो जाये हम रुकेंगे नहीं | कोई भी काम बिना संकळप के पूरा नही हो सकता चाहे काम छोटा हो या बड़ा | संकळप वो महान शक्ति हैं जो कोई भी किसी काम को पूरा करने में अंत तक साथ देता हैं |

माना कोई विद्यार्थी संकळप ले की इस बार अच्छे अंक परीछा में लाने हैं तो उसको अपने इस संकळप को पूरा करने के लिए सुबह उठना पड़ेगा, पढ़ायी भी करनी पड़ेगी | तभी ये कामना पूरी हो सकती हैं | लेकिन प्रातः काल उठने पर बार बार नींद आने का भी पूरी सम्भावना होती हैं | यही पर जो सो गया उसने सब कुछ खो दिया | जिसको कुछ पाना हैं वो बहुत कुछ त्याग कर के ही वो प्राप्त कर सकता हैं चाहे वो कुछ भी हो |

जब कोई काम शुरू करना होता हैं तो बहुत सी मुश्किलें हमारे सामने आती हैं | अगर हम मुश्किलों से डर कर काम को छोड़ दे तो वो काम हमें ही छोड़ देगा | यहीं किसी ने संकळप से वो काम शुरू किया चाहें कुछ भी हो जाएं काम तो पूरा किए बिना मैं नहीं रुकूँगा तो काम जरूर पूरा होता हैं | हम कोई चीज़ अगर नही प्राप्त कर पाते हैं तो गलती दूसरों की दे देते हैं की अगर ऐसा होता तो मैं ये कर लेता पर ऐसा होता नहीं है कमी हमने ही छोड़ी हैं कही पर |

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