बचपन में पिता ने एसिड से जला दी थी ज़िन्दगी. आज वो अपनी कहानी से रौशन कर रही है सबकी ज़िन्दगी

08 जून 2018   |  अभय शंकर   (130 बार पढ़ा जा चुका है)

बचपन में पिता ने एसिड से जला दी थी ज़िन्दगी. आज वो अपनी कहानी से रौशन कर रही है सबकी ज़िन्दगी - शब्द (shabd.in)

एसिड अटैक सर्वाइवर्स को समाज या तो बहिष्कृत महसूस कराता है या फिर उनको संवेदना और दया भाव से ही देखा जाता है. दया दिखाने से ज़्यादा ज़रूरी है संवेदनशीलता दिखाना. सर्वाइवर्स की जगह पर ख़ुद को रखकर सोचने की ज़रूरत है.


Source- Ketto

Humans of Bombayफ़ेसबुक पेज पर एक एसिड अटैक सर्वाइवर की कहानी साझा की गई. शब्बो के साथ जो हुआ उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. 23 वर्षीय शब्बो का गुनहगार आज भी खुली हवा में ही सांस ले रहा है. पोस्ट में ये लिखा गया-


'जब मैं 2 साल की थी तब मेरे पापा ने गुस्से में मेरी मां पर एसिड डाल दिया था. मैं उस वक़्त मां की गोद में ही थी, आधा एसिड मुझ पर गिरा. डॉक्टर गोरे ने ये मुझे ये कहानी सुनाई, मैं इतनी छोटी थी कि मुझे वो घटना याद नहीं. मुझे बस इतना पता है कि मैंने उस अटैक में अपनी मां को खो दिया और मेरी हालत देखकर मेरे रिश्तेदारों ने मुझे नहीं अपनाया. मेरे पिता शहर छोड़कर भाग गए और मैं एक अनाथालय में बड़ी हुई.


मुझे अनाथालय में बहुत प्यार मिला. मेरे बचपन काफ़ी अच्छा बीता.


लेकिन असल दुनिया में थोड़ी दिक्कतें आईं. मैं कॉलेज में सबसे लास्ट बेंच पर बैठती, अकेले लंच करती, मेरा कोई दोस्त नहीं था. मुझे हमेशा लगता कि सभी मुझे ही घूर रहे हैं.


लेकिन ये सब मेरा वहम था. कुछ दिनों बाद मेरे बहुत से दोस्त बनें जिनके साथ मेरी बहुत सी यादें हैं. मुझे एक ऐसा ही वाक्या याद है. एक बार हम लोग एक दोस्त के घर पर रुके थे. मैं सो गई, लेकिन एसिड अटैक की वजह से मेरी पलकें बंद नहीं होती. मेरे दोस्त मुझ से बातें करते रहें ये सोचकर कि मैं जाग रही हूं, उन्हें थोड़ी देर बाद पता चला कि मैं तो सो चुकी थी. उस घटना को याद कर के हम आज भी काफ़ी हंसते हैं. ज़रा सोचिये मेरे लिए क्लास में सोना कितना आसान है. मुझे तो लगता है कि मेरे पास Superpower है.


मेरे दोस्त मुझसे अकसर पूछते हैं कि क्या मैं अपने पापा से नफ़रत करती हूं, क्या मैं उनसे बदला लेना चाहती हूं? मेरा जवाब हमेशा 'ना' होता है. मैंने उन्हें माफ़ कर दिया है.


मेरी ज़िन्दगी में नफ़रत की कोई जगह नहीं है. मुझे पिछली नौकरी से मेरे Looks के कारण और चेकअप के लिए ज़्यादा छुट्टियां लेने के कारण निकाल दिया गया.

उसके बाद से Saajas Foundation मेरी देखभाल कर रहा है. मुझे यक़ीन है कि मुझे जल्द ही दूसरी नौकरी मिल जाएगी.


मुझे सबसे ज़्यादा नफ़रत किसी चीज़ से है तो सिर्फ़ इससे कि लोग मुझे एसिड अटैक विक्टिम कहते हैं- मैं विक्टिम नहीं हूं! मैं बाकी लोगों की तरह ही नॉर्मल हूं. मेरे शरीर पर काफ़ी सारे दाग़ हैं लेकिन मैं भविष्य को लेकर आशावादी हूं. मेरे भी सपने हैं, ज़िन्दगी का मकसद है. मैं भी इस दुनिया पर अपनी छाप छोड़ना चाहती हूं.'



शब्बो को Stage Designing और Costume Styling में रूचि है. सर्जरी से ही उसकी पलकें, नाक आदि दोबारा बनाए जा सकते हैं. वो आगे पढ़ना चाहती है और आत्मनिर्भर बनना चाहती है.

अगर आप उसके सपनों को पूरा करने में सहायता करना चाहते हैं, तो इस वेबसाइट पर जाएं-

https://www.ketto.org/fundraiser/helpshabbo


बचपन में पिता ने एसिड से जला दी थी ज़िन्दगी. आज वो अपनी कहानी से रौशन कर रही है सबकी ज़िन्दगी

https://www.gazabpost.com/inspiring-story-of-a-acid-attack-survivor

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