रिश्ते

08 अप्रैल 2015   |  सुशील चन्द्र तिवारी   (295 बार पढ़ा जा चुका है)

दाग बेशक ढ,ूँढिये,,दामन न खींचिये,


ख़ुद की करतूतों से यूँ,,,आँखें न मींचिये ।





दोस्त जिगरी हो तुम्हारा ,,या निरा मुख़ालिफ़ ,


ज़िन्दगी में रिश्ते,, शराफ़त से सींचिये ।





जो तुमहे मजबूर नज़रों से,,, बुलाता हो,


ज़ख़्म सहलाकर उसे,,बाहों में भींचिये ।





बाद तेरे याद कर,,रोया करे'सुशील'


ऐसी मोहब्बत हरेक,,ज़ेहन में दीजिये

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धन्यवाद ,गयानेनदर जी

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