खन्त-मतैयाँ

10 अप्रैल 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (273 बार पढ़ा जा चुका है)

खन्त-मतैयाँ

उसकी कमीज़ का
कॉलर फटा था,
सर से पाँव तक
पसीने-पसीने;
पादुकाएं, घिसी इतनी
कि खीसें काढ़े I
चोर निगाहों से
इधर-उधर देखा उसने,
बिजली के खम्भे तले
पड़ी सूखी रोटी पर,
छितरा सा भात उठाया I
जो टोका उसको,
पूछ लिया उससे-
"हा s s s छी-छी!
क्यों करते हो ऐसा?
मेरी आँखों में ऑंखें डाल
वो बोला.....................
"खन्त-मतैयाँ, कौड़ी-पैयाँ,
छन्न-पकइयां, लब्बो-लैया,
लुक-छिपी औ' चोर-सिपहिया;
ज़िन्दग़ी के साथ, खेला है कभी ?"
शब्द, समझ से परे थे,
मायने, उसकी आँखों से टपककर
छिप गए, रोटी पर रखे
उसी भात में I
मैं नज़रें झुकाए,
उन्हीं चावल के
छितरे दानों में,
ढूंढ रहा था कुछ...








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