साहस

13 अप्रैल 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (253 बार पढ़ा जा चुका है)

निश्चय ही मनुष्य की संकल्प शक्ति का पारावार नहीं, यदि वह मानसिक तथा शारीरिक क्षमता बढ़ाने में ही स्वयं को लगा दे, तो ऐसा बलवान बन सकता है जिसे देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाएँ. दृढ संकल्प के साथ उद्द्यम, आशा और साहस का संयुक्त समन्वय हो, तो वह असाध्य रोगों से भी लड़ सकता है. मनुष्य, दृढ संकल्प शक्ति के बल पर, मांसपेशियों को फौलाद बना सकता है. मुख-सज्जा जितनी समस्त श्रृंगार साधनों से मिलकर हो सकती है, उससे असंख्य गुनी अधिक सुंदरता वह मुस्कान, मस्ती और हंसी-खुशी के द्वारा अर्जित कर सकता है.


साहस किन्हीं बाह्य साधनों से नहीं लाया जाता, यह तो सदैव मनुष्य के अंतःकरण में विद्द्यमान है. समय आने पर उसे मात्र जगाने भर की आवश्यकता होती है. सूझबूझ, दूरदर्शिता, प्रत्युत्पन्नमति साहसी व्यक्तियों को उचित सम्बल प्रदान करते हैं एवं श्रेय तथा सम्मान के अधिकारी बनाते है.







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