भ्रष्टाचार

13 अप्रैल 2015   |  निवेदिता चतुर्वेदी   (230 बार पढ़ा जा चुका है)

भ्रष्टाचार की तो अंत ही न दिखती ,


जहां देखो वहाँ मूहँ फाड़े खड़ी ,


मैंने भी आज वही द्देखि ,


बीच बाजार में खड़ी हुई |





किसी की नजर ही न पड़ती ,


पड़ती भी तो झुक जाती ,


आखिर क्या है इसमें वो ,


सामने देखे पर कोई न बोलें |





आखिर अब समझ में आई ,


भ्रष्टाचार कोई और नहीं ,


ये तो हम और आप हैं ,


जो इसे सह देकर बढ़ा रहे है |


................निवेदिता चतुर्वेदी

अगला लेख: मित्रता



हमारा सही मूल्यांकन किया है आपने आपको बधाई ..

सुन्दर अभिव्यक्ति !

ji dhanybad

कम शब्दों में भी अपने बड़ी बात लिखी है ..... धन्यवाद

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x