सौतेली माँ

25 जून 2018   |  कुनाल मंजुल   (407 बार पढ़ा जा चुका है)

सौतेली माँ

आकाश की दूसरी शादी हो चुकी है, पहली शादी उसने 21 साल की उम्र में ही कर ली थी। घरवालों की मर्जी के खिलाफ लव मैरिज की थी। पहली पत्नी का नाम राधा था। 2 साल पहले ही राधा चल बसी। cancer हो गया था उसे, आकाश अपनी लाख नामुमकिन कोशिशों के बाद भी अपनी राधा को बचा नहीं पाया! असल में आकाश दूसरी शादी करना ही नहीं चाहता था, पूरी तरह बिखर चुका था। राधा के गुज़र जाने के बाद वो जैसे जीना ही भूल चुका था, उसके घरवाले उसे यूँ देखकर परेशान हो चुके थे, अभी सिर्फ 40 साल का ही तो हुआ था। अभी भी बहुत ज़िंदगीं बाकी थी। इसलिए घरवालों की मर्जी के आगे उसे हार माननी पड़ी। उसकी एक बेटी भी है जो शादी के ठीक 2 साल बाद हो गयी थी। उसकी और राधा की निशानी आँचल। जो अब 17 साल की हो चुकी थी।


आकाश की दूसरी पत्नी का नाम राधिका था। ये संयोग ही था कि उसे पहले राधा और अब राधिका मिली थी। राधिका भी बिल्कुल राधा की तरह ही थी, उसका बोलचाल, उसकी कुछ-कुछ आदतें राधा के जैसी ही थीं। आकाश न चाहते हुए भी राधिका को स्वीकार करने लगा था। आँचल का रवैया भी अभी तक ठीक था अपनी माँ को लेकर। अभी तक सब कुछ ठीक था।
लेकिन कुछ दिनों से आँचल का रवैया राधिका के लिए अजीब हो गया था।
राधिका की तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है। आँचल हर चीज़ को लेकर, हर बात को लेकर राधिका पे तंज़ कसती रहती। और अगर राधिका उसे कुछ समझाने की बात कहती या उससे बात करने की कोशिश करती तो कहती कि मैं तुम्हारी सगी बेटी नहीं हूँ इसलिए मुझमें हर वक़्त कमी निकालती हो, इसलिए मुझे हर वक़्त नीचा दिखाना चाहती हो।


राधिका रोती हुई अपने कमरे में वापस आ गयी। एक धक्का लगा था उसके वजूद को। उसने कभी जिस सौतेले "शब्द" को अहमियत ही नहीं दी, वही शब्द उसकी और उसकी बेटी की ज़िंदगी में आ चुका था। अब ये हर रोज़ हुआ करता था। रोज़ राधिका को सौतेलेपन का अहसास कराया जाता। अब रिश्तों में सौतेलेपन की एक नयी समस्या खड़ी हो गयी थी।
मुश्किल ये थी कि अगर आकाश आँचल का पक्ष लेता तो राधिका घुटती थी, और अगर राधिका की तरफदारी करता तो आँचल को बुरा लगता था। शायद आकाश ये बात समझता था इसलिए दूसरी शादी नहीं करना चाहता था। पर विडंबना ये थी समय के साथ-साथ ये सौतेलापन का पेड़ बहुत घना होता जा रहा था। आकाश अबतक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा था। हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। आकाश ये तो समझ चुका था कि राधिका ऐसी तो बिल्कुल नहीं थी, क्योंकि जहाँ तक आकाश ने उसको देखा, उसको समझा तो उसको राधिका में कोई बुराई नज़र नहीं आयी, कुछ कमियाँ जरूर थी पर वो भी ऐसी नहीं थी कि उनसे ज्यादा बड़ा मसला बने। वहीं आँचल भी ऐसी ही थी, समझदार, सुलझी हुई। हाँ बस मॉडर्न थी, खुली सोच खुले विचारों की। अपनी हर बात बेबाँकी से रखने वाली। आकाश अब चुप रहना सीख रहा था, सोच रहा था माँ बेटी खुद एक दूसरे को वक़्त दें, तो शायद बात बन सकती थी।


लेकिन असल परेशानी वहाँ नहीं थी। असल परेशानी थी, वो चंद रिश्तेदार, वो पड़ोसी, कुछ आँचल के आग लगाने वाले दोस्त। आँचल की बुआ, उसकी ताई, उसकी मामी, उसकी मासी, और भी दकियानूसी सोच वाले न जाने कितने लोग थे, जिन्होंने सौतेलेपन का बीज बो दिया था उसके मन में। एक दिन अचानक राधिका बहुत बीमार पड़ गई, अस्पताल में भर्ती हो गई। पर कुछ लोग होते हैं ना जो अपने दुख से नहीं बल्कि दूसरों के सुख से दुखी होते हैं। आँचल उसे देखने तक नहीं गई। क्योंकि उसके लिए वो सौतेली माँ थी। राधिका को ठीक होने में वक़्त लगा, काफी कमजोरी आ गई थी, पर उसकी असली बीमारी तो ये सब नहीं थी, असल में उसकी असली बीमारी आँचल का बार-बार उसे सौतेलेपन का बोध कराना था।
माँ-बेटी के इस सौतेलेपन का पेड़ अब विशाल हो चुका था, जिसपर रोज़ नई कोंपल रोज़ नई शाखें निकल आती थीं। उधर आकाश इतना असहाय तो तब भी नहीं हुआ था जब राधा उसे छोड़ के चली गई, क्योंकि तब भी उसके पास राधा के साथ बितायीं हुईं खूबसूरत यादें थीं। लेकिन अब तो वो दो पाटों में पिस रहा था। दोहरी मार पड़ रही थी उसे। पूरे घर में लोगों से ज्यादा अब तनाव रहता था।


एक दिन आँचल रोते हुए घर आयी, उसको देखकर लग रहा था कि कुछ बहुत बुरा हुआ है। लेकिन आँचल बस रोये जा रही थी, किसी से बात नहीं कर रही थी। आकाश ने जैसे-तैसे आँचल से बात की, उसने बताया कि पड़ोस की कामिनी आँटी के बेटे राजीव ने बीच चौराहे पर उसका हाथ पकड़ा।
ये सब सुनते ही, पुरानी ख़यालात वाले दादी और दादा बोले, "हम तो कहते ही थे कि इसको समझाओ, ढँग के कपड़े पहने, अब उस लड़के से जाके क्या कहोगे? समाज में बेइज्जती होगी सो होगी, कल को इसकी शादी में भी अड़चनें आएँगी। वो तो लड़का है, उससे तो कोई कुछ नहीं कहेगा, ये समाज एक दो दिन याद रखेगा और भूल जाएगा। लेकिन लड़कियों को ये नसीब नहीं मिलता। हम तो कहते हैं कि........तभी राधिका बीच में बोल पड़ी, "क्या आप कहते हैं, क्या सही कह रहे हैं आप, मेरी बेटी का जो मन आएगा वो पहनेगी, जैसे मन आएगा वैसे रहेगी, लेकिन इस सबका ये तो मतलब नहीं कि लड़कों को लाइसेंस मिल जाता है किसी का भी हाथ पकड़ सकें। वो आपका ज़माना था लेकिन ये आज का ज़माना है, उसने बीच सड़क पे मेरी बेटी का हाथ पकड़ा है, इसकी सज़ा उसे मिलेगी।" सब बोले बहु तू ये क्या कर रही है। लेकिन राधिका ने आकाश की तरफ देखा, जैसे उसकी इजाज़त माँग रही हो।


आकाश का पारा सातवें आसमान पर था, वो तेज कदमों से राजीव के घर की तरफ निकला, तभी राधिका ने उसका हाथ पकड़कर उसे रोक लिया। आकाश गुस्से से बोला, "राधिका, मुझे जाने दो, "मैं आज बताऊँगा उनको मेरी बेटी का हाथ पकड़ने की सजा कितनी भयानक होगी।"
राधिका बोली, " मैंने आपको इसलिए नहीं रोका की आप उसे सजा देने जा रहे हो बल्कि इसलिए रोका की आप अकेले जा रहे हो।"
राधिका ने आँचल का हाथ पकड़ा और बोली, "चल बेटी, जितना दर्द तुझे हुआ है, उसका हिसाब लेते हैं।"
आँचल एकटक राधिका को निहारे जा रही थी, फिर कुछ देर चुप रही और रोते हुए बोली, "माँ मुझे माफ़ कर दो......" लेकिन राधिका ने उसको गले से लगाते हुए कहा, "चुप कर कितना रोयेगी" दोनों माँ बेटी गले लगकर रोने लगी। सौतेलेपन का जो पेड़ विशाल हो चुका था वो अब किसी तिनके की तरह हवा में उड़ गया। आज आँचल को उसकी माँ की कमी नहीं खल रही थी। अगर आज राधा भी होती तो वो भी ऐसे ही अपनी बेटी की तरफदारी करती जैसी आज राधिका ने की।
अब तीनों लोग राजीव के घर के बाहर थे। दरवाजे की घंटी बजाने पर राजीव की माँ बाहर आयीं।


और उनके पीछे राजीव भी आकर खड़ा हो गया। उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था सिर्फ बेशर्मी थी। जब आँचल ने उसकी हरकत के बारे में बताया तो राजीव किसी मंझे हुए खिलाड़ी की तरह खुदको बचाने लगा। जब उसका कोई दाँव काम नहीं आया तो आँचल से बोला, "तू खुदको क्या समझती है, जब तुझे अपनी सौतेली माँ से लड़ाई करके मन नहीं भरा तो यहाँ आ गयी ड्रामा करने। सारा मोहल्ला जानता है कि तुम माँ-बेटी के बीच कितना पंगा होता है। आज यहाँ दिखावे के लिए साथ चली आयीं।" आकाश राजीव को थप्पड़ मारने ही वाला था कि राधिका ने उसका हाथ पकड़ लिया, ये देखकर राजीव बोला, "क्यों आँटी सच बोला तो मिर्ची लगती है, यहाँ कितनी भी एक्टिंग कर लो आखिर तो तुम इसकी सौतेली माँ हो। माफ कीजिये, एक गिरी हुई बेटी की सौतेली माँ।"


राधिका ने एक जोरदार तमाचा राजीव को जड़ दिया, और बोली, "तुझमें इतनी हिम्मत की तू मेरी बेटी को गिरा हुआ बोले।"
राजीव गुस्से से बोला, "आखिर तो तुम इसकी सौतेली माँ हो, कितना भी अच्छा ड्रामा कर लो। सगी माँ थोड़े ही बन पाओगी।"
राजीव के गाल पे एक और तमाचा पड़ा। इस बार आँचल ने हाथ उठाया था। आँचल गुस्से में बोली, "अगर मेरी माँ के खिलाफ एक और शब्द कहा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
राधिका ने राजीव को देखा फिर सख्त लहज़े में बोली, " मैं तो तुम्हें समझाने आयी थी, सोचा था बच्चे हो अपनी गलती का तुम्हें पछतावा होगा। लेकिन तुम इतने बेशर्म हो कि तुम्हें समझाइश की नहीं बल्कि सुधारने की जरूरत है।"


ये कहकर राधिका ने पुलिस को फोन कर दिया....
लेकिन इस हादसे के बाद माँ-बेटी के बीच सौतेलेपन का पेड़ एक विश्वास के मजबूत धागे से जुड़ चुका था। आँचल आज समझ चुकी थी और ये बहुत अच्छे से जान चुकी थी कि मैं सौतेली या सगी नहीं होती... माँ तो सिर्फ माँ होती है।


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