बेटियों की सिसकियाँ

01 जुलाई 2018   |  नीरू मोहन'वागीश्वरी'   (302 बार पढ़ा जा चुका है)

बेटियों की सिसकियाँ

माँ …मुझे मौत दे दो ???? मर्म की चीख जागरुकता लेख क्यों आज हर माँ को यह कहने की स्थिति में पहुँचा दिया है कि… 'अगले जन्म मुझे बिटिया न दीजो' और एक बेटी को यह कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि… 'अगले जन्म मुझे बिटिया ना कीजो' आज देश में जो हालात हैं छोटी-छोटी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं उनको यूँ कुचला जा रहा है मानो वो इंसान नहीं कोई खिलौना हों । लक्ष्मी कही जाने वाली, नवरात्रों में पूजी जाने वाली इन कन्याओं के साथ ऐसा कुकर्म करके कैसे यह हैवान चैन से रहते है । क्या इनका ज़मीर मर गया है ? क्या इनके लिए कानून अँधा हो जाता है या वाकई में कानून की आँखों पर पट्टी बँधी है जो देश की बेटियों को सुरक्षित नहीं कर पा रहा है । आए दिन ऐसी घटनाएँ देखने को मिल जाती हैं क्या सत्ताधारी लोगों को दिखाई और सुनाई देना बंद हो गया है ? आज हालात हैं कि नेता कहते रहते हैं । हमें देश की चिंता है । हम देश हित के लिए सोचते है । देश की सीमा सुरक्षित होनी ज़रूरी है । उनको कौन समझाए कि देश को ख़तरा देश के बाहर वालों से नहीं देश के अंदर वालों से है । जिस देश की जनता सुरक्षित नहीं है छोटी-छोटी बच्चियाँ सुरक्षित नहीं हैं ऐसे देश में सीमा सुरक्षा की बात बेमायने प्रतीत होती है । आज हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकते हैं । उन्हें क्या पड़ी है कि वह सोचें कि देश में क्या हो रहा है, देश किन स्थितियों से गुज़र रहा है । देश के अंदर क्राइम, भ्रष्टाचार लूट, अत्याचार, हैवानियत बढ़ती जा रही है । दूसरी और नेताओं को एक दूसरे पर छींटाकशी करने से फुर्सत ही नहीं है । एक छोटी बच्ची के साथ हैवानियत की हद पार कर दी जाती है उसे बेपर्दा कर छोड़ दिया जाता है । ऐसे हैवानों को क्या कहा जाए जो इस तरह का कुकर्म करने के लिए हैवानियत की सीमा लाँघकर किसी मासूम के साथ ऐसा बेरहम व्यवहार करते हैं कसाई से भी ज्यादा जल्लाद हो चुके हैं आज की ये असंस्कारी जात । जो न किसी धर्म, जाति और समुदाय सेसंबंध रखती है । इनकी सिर्फ़ एक जाति 'जल्लाद' ही हो सकती है । आज मंदसौर की इस घटना ने 'निर्भया कांड' का जख्म ताज़ा कर दिया है । क्या कर रही है हमारी सरकार … हर रोज़ एक निर्भया का मर्म हमारे समक्ष हमारी रूह को कंपन दे रहा है । इन बच्चियों के साथ क्या इंसाफ नहीं होगा ? क्या इस निम्न स्तर तक हैवानियत करने वाले खुलेआम ऐसा जघन्य अपराध करते रहेंगे ? क्यों नहीं उनके ख़िलाफ हमारे देश की सरकार कोई सख्त कानून बनाती जिससे इस अपराध को करने की सोचने वालों की रूह तक कांप जाए । क्यों नहीं सरकार ऐसे लोगों को अपंग बनाकर सूली पर नहीं चढ़ाती ? ऐसे हैवानों की तो पहले आँखें नोच लेनी चाहिएँ जिससे वह देवी रूपी कन्या को गन्दी और तुच्छ नज़रों से देखते हैं उसके बाद उनके हाथों को काट डालना चाहिए जिससे वह उसे छूते हैं और अंत में उन्हें नपुंसक बना कर जिंदा चौराहे पर लटका कर जला देना चाहिए जिससे उन्हें एहसास हो कि एक बच्ची के साथ जो वह करते हैं वह कितना मार्मिक है । ऐसे हैवानों को तड़पा-तड़पा कर मृत्यु के द्वार पर अधर लटका देना चाहिए जिससे मौत माँगने पर ये राक्षस मजबूर हो जाएँ आज इंसानियत कही खो गई है । देशवासी यह क्यों नहीं समझते बेटी…सिर्फ़ बेटी है । न वो हिंदू न मुसलमान है न सिख न ईसाई है वह एक मासूम है … वह बेटी है । पृथ्वी पर इंसान को सभ्य कहा गया है क्या वाकई में वह सभ्य है । क्यों इंसान इंसानियत इंसानियत त्याग असभ्य बनता जा रहा है । एक जानवर की भांति व्यवहार कर रहा है । क्या यही विकास है …अगर ऐसा कुकृत्य विकास की दिशा का निर्वाह करेगा तो ऐसा विकास नहीं चाहिए जहाँ संस्कारों की हत्या कर विकास का नाम दिया जाता है । देश…देश… देश… का रोना रोता रहता है हर नेता , मेरा देश, मेरा वतन का राग अलापता है ; उन्हें पता ही नहीं इसकी परिभाषा क्या है । जिस प्रकार एक घर चारदीवारी से नहीं उसमें रहने वाले लोगों से घर कहलाता है उसी प्रकार एक देश का अस्तित्व भी उसमें रहने वाले लोगों , उनकी सुरक्षा से संबंध रखता है । हमारा देश बहुसांस्कृतिक देश है जहां हर कौम, जाति, धर्म और समुदाय के लोग रहते हैं । जाति और धर्म के नाम पर दर्द को अाँकना कहाँ का न्याय है । आज बहुत ही विकट समस्या है संस्कारों के ह्वास की जिसका परिणाम है जीवन में पीड़ा, दर्द और भावनाओं का स्थान का नगण्य हो जाना । किसी को भी किसी अन्य की पीड़ा और दर्द का एहसास नहीं होता । मनुष्य स्वार्थी होता जा रहा है । आज बेटियाँ घर या बाहर कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं दरिंदे घात लगाकर बैठे रहते हैं । माँ अपनी बेटियों को घर से बाहर भेजने से घबराती हैं । जब तक बेटी घर वापस नहीं पहुँचती माँ-बाप की चिंता का विषय बनी रहती हैं । क्या ऐसे समाज की कल्पना की थी हमने ? क्या हम ऐसा समाज चाहते थे जहाँ हर कदम पर खतरा… खतरा…और सिर्फ़ खतरा ही है । मैं अपनी और पूरे देश की जनता की तरफ से कहना चाहती हूँ कि जब तक इस अपराध के लिए सख़्त कानून नहीं बनेगा तब तक ऐसे दरिंदे रोज़ ही किसी न किसी मासूम को अपने गलत इरादों की भेंट चढ़ाते रहेंगे । सोए हो क्यों …तुम्हें जगना होगा । बहन, बेटी की लाज की ख़ातिर नया नियम कोई घड़ना होगा । करे न कोई बेपर्दा इनको कानून ऐसा तुझे घड़ना होगा । रूह कांपें ज़ालिम की बस अब ऐसा न्याय तुझे करना होगा । लेखिका नीरू मोहन 'वागीश्वरी'

बेटियों की सिसकियाँ

अगला लेख: फिल्मी पर्दा करे बेपर्दा



नवीन बोडखे
03 जुलाई 2018

बहुत ही मार्मिक लेख है आपका

Bajrang Jangra
02 जुलाई 2018

अति सुंदर प्रेरणा जी अति सुंदर प्रेरणा जी

आदरणीय नीरू जी,आपने बहुत ही जवलंत प्रश्न उठाया है. ऐसे दरिंदे को सिर्फ जेल की सजा नहीं मिलनी चाहिए.इन्हे मौत की सजा मिलनी चाहिए. जब तक हमारी सरकार इन्हे नपुंसक कर चराहे पर जिन्दा जलने की सजा नहीं सुनती तब तक इन दरिंदो की रूह नहीं कापेगी.मैं भी एक बेटी की माँ हूँ और हर पल इसी डर से गुजरती हूँ .हम औरतो को ही अपनी और अपनी बेटियों के रक्षा के लिए आगे आना होगा.इन दरिंदो से अपनी बेटियों का बचने के लिए हम सरकार और कानून के भरोसे न बैठ कर अपने आँख कान खुले रख ऐसे दरिंदो पर नज़र रखनी होगी.आप तो एक समाजसेविका है हमारी और हमारी बेटियों की पीड़ा को सरकार के कानो तक पंहुचा सकती है.हमे विश्वास है आप ऐसा एक दिन जरूर करेगी .आप को सादर नमन .

समाज को झकझोरता एवं आईना दिखाता हुआ दिव्य मर्मस्पर्शी लेख ,,,,,,, सादन नमन

रेणु
01 जुलाई 2018

आदरणीय नीरू जी -- बहुत हे मर्मान्तक प्रश्न है और बहुत ही घृणित कुकर्म हैं वहशियों के जिन्हें फूल सी बच्चीयों में भी एक औरत नजर आती है अपूर्ण और अविकसित अंगों वाली इन बच्चियों ने कौन से भडकाऊ वस्त्र पहनतीहैं -- जिसकी सजा इन्हें इस हाल में मिलती है | बहुत विचारणीय लेख --

आभार आदरणीया

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
25 जून 2018
26 जून 1975 देश में आपतकाल की घोषणा डॉ शोभा भारद्वाज 26 जून 1975 ,आकाशवाणी से न्यूज रीडर के बजाय तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिराजी ने आठ बजे की न्यूज में स्वयं आपतकाल की घोषणा की ‘भाईयो और बहनों राष्ट्रपति महोदय ने आपतकाल की घोषणा की है इससे आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है’ |ब
25 जून 2018
07 जुलाई 2018
टे
सुर्ख अंगारे से चटक सिंदूरी रंग का होते हुए भी मेरे मन में एक टीस हैं.पर्ण विहीन ढूढ़ वृक्षों पर मखमली फूल खिले स्वर्णिम आभा से, मैं इठलाया,पर न मुझ पर भौरे मंडराये और न तितली.आकर्षक होने पर भी न गुलाब से खिलकर उपवन को शोभायमान किया.मुझे न तो गुलदस्ते में सजाया गया और न ही माला में गूँथकर द
07 जुलाई 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x