इनको चूमो

16 अप्रैल 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (288 बार पढ़ा जा चुका है)

इनको चूमो

साथियो,

प्रस्तुत कविता हिंदी साहित्यकार शिवमंगल सिंह 'सुमन' की पुरस्कृत रचना 'मिटटी की बारात' से उद्घृत है. इस रचना के लिए आपको वर्ष १९७४ में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा वर्ष १९९३ में भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया.




कीचड़-कालिख से सने हाथ
इनको चूमो
सौ कामिनियों के लोल कपोलों से बढ़कर
जिसने चूमा दुनिया को अन्न खिलाया है
आतप-वर्षा-पाले से सदा बचाया है।

श्रम-सीकर से लथपथ चेहरे
इनको चूमो
गंगा-जमुना की लोल-लहरियों से बढ़कर
माँ-बहनों की लज्जा जिनके बल पर रक्षित
बुन चीर द्रौपदी का हर बार बढाया है।

कुश-कंटक से क्षत-विक्षत पग
इनको चूमो
जो लक्ष्मी-ललित क्षीर-सिंधु के
चर्चित चरणों से बढ़कर
जिनका अपराजित शौर्य
धवल हिम-शिखरों पर महिमा-मण्डित
मानवता का वर्चस्व सौरमण्डल स्पंदित कर आया है।


-शिवमंगल सिंह 'सुमन'

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सचिन शर्मा
16 अप्रैल 2015

मर्मस्पर्शी रचना...., अति उत्तम.

एक उत्कृष्ट संकलन-धन्यवाद

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