आना-जाना साँसों का

16 अप्रैल 2015   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (221 बार पढ़ा जा चुका है)

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जिन्दगी की शतरंज में , है नहीं ठिकाना पासों का |
बीत जाएगा चन्द दिनों में,ये मौसम मधुमासों का ||
जो करना है जल्दी करले , ओ अनाड़ी इन्सान ,
क्या पता कब रुक जाए , ये आना-जाना सांसों का ||
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