अमरनाथ की अमर गुफा ----- आचार्य अर्जुन तिवारी

01 जुलाई 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (170 बार पढ़ा जा चुका है)

अमरनाथ की अमर गुफा ----- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *आदिकाल से ईश्वर की सत्ता सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विद्यमान है | परंतु सृष्टि के प्रारम्भ से ही ईश्वरीय सत्ता को मानने वाले भी इसी ब्रह्माण्ड में रहे हैं जिन्हें असुर की संज्ञा दी गयी है | समय समय पर इस धरती पर ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण मिलता रहा है | उन्हीं प्रमाणों में एक ज्वलन्त प्रमाण है भगवान शिव का स्वयंभू अमरनाथ स्वरूप | भगवान शिव अमरनाथ (अमरेश्वर महादेव) के रूप में प्रतिवर्ष प्रकट होते हैं और भक्तों को दर्शन देकर यथासमय अन्तर्ध्यान भी हो जाते है | हिमालय का कैलाश क्षेत्र भगवान शिव का घर कहा गया है | इनकी सत्ता को न मानने वाले लोगों को वहाँ के विषय में अध्ययन करना चाहिए | भगवती पार्वती को अमरकथा सुनाने के लिए भगवान शिव ने जिस गुफा को चुना वही आज अमरगुफा के नाम से प्रसिद्ध है | पार्वती जी के अतिरिक्त अमरकथा सुनने वाले वाले शुकदेव जी व कालान्तर में भगवान शिव से शापित उनके दो शिष्य जो कि कबूतर रूप में परिवर्तित हो गये थे वह भी अमर हो गये | आज भी भक्तों को उस दिव्य गुफा में इन कबूतरों के दर्शन होते रहते हैं | अमरता को न मानने वाले इस बात पर विचार अवश्य करेंगे कि -- जहाँ प्राणवायु (ऑक्सीजन) नाममात्र को है , जहाँ खाने को बर्फ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है वहाँ ये कबूतर आखिर कैसे जीवित हैं | सतयुग से लेकर आज तक उस गुफा में देवताओं , ऋषियों / महर्षियों ने समय समय पर भगवान शिव के स्वनिर्मित दिव्य स्वरूप का दर्शन पाया है | दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में यह स्थान होने के कारण वहाँ सबका जाना सम्भव नहीं था | वहाँ तक अपनी तपस्या करने मात्र तपस्वी ही जा पाते थे |* *आज भगवान शिव के स्वयंभू स्वरूप "अमरनाथ" के विषय में आम जनमानस में भ्रांतियां भर दी गयी हैं | आज के इतिहासकार अपने इतिहास में लिखते हैं कि इस स्थान की खोज बूटा मलिक नामक मुस्लिम गड़रिये ने की है जो कि वहाँ अपनी भेड़ बकरियों को चराने गया था , तभी से वहाँ इस ज्योतिर्लिंग का पूजन होने लगा | मैं आचार्य अर्जुन तिवारी" उन इतिहासकारों से पूछना चाहता हूँ कि जहाँ ऑक्सीजन का अभाव है क्या वहाँ बैठकर भेड़ बकरियाँ चराना आसान है | कदापि नहीं | यह सनातन विरोधियों की मानसिकता है जो आज इतिहास बनकर बोल रही है | क्या आज के १५० साल पहले कोई इस पवित्रगुफा के विषय में नहीं जानता था ?? बिल्कुल जानता था ! पुराणों में इस पवित्र गुफा का वर्णन मिलता है , सबसे पहले इस पवित्र गुफा में स्वयंभू शिवलिंग का दर्शन महर्षि भृगु ने किया था | तो क्या हमारे पुराण आज लिखे गये हैं ?? क्या महर्षि भृगु १५० साल पहले ही थे ?? जी नहीं ! अब तो पुरातत्व विभाग ने भी माना है कि यह लगभग ५००० वर्ष या इससे अधिक प्राचीन है | पुरातत्व विभाग की इस मान्यता पर यदि ध्यान दिया जाय तो "बूटा मलिक" वाली कहानी अपने आप निराधार हो जाती है | क्योंकि मलिक जिस धर्म से सम्बन्ध रखता है उस धर्म को धरातल पर आये कुल १४०० वर्ष (लगभग) ही हुए हैं | तो क्या पुराणों में लिखे तथ्य या पुरातत्व विभाग की बात निराधार मान ली जाय ?? विचार कीजिए कि आज हमें कैसा इतिहास पढाया जा रहा है , जिसे पढकर हम अपने ही विषय में अनभिज्ञ होते जा रहे हैं |* *इतिहास एवं पुराण ही हमारे मार्गदर्शक हैं ! आवश्यकता यह है कि इतिहास को पढने के बाद पौराणिक ग्रंथों के माध्यम से हम उसकी पुष्टि अवश्य करें | तभी हमें वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकता है |

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