तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे।

17 अप्रैल 2015   |  निवेदिता चतुर्वेदी   (564 बार पढ़ा जा चुका है)

तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे।

तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे। हमें छोड़ कर आखिर कहाँ जाओगे। मैं आश लगाये बैठीं हूँ, कब मेरे सपने पुरा करोगे। तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे। हमें ये भी पता है,तुम पुरा करेंगे। पर कुछ परेशानियां तो दोगे ही। परेशानियां ही सही पर पुरा तो करोगे। तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे। हमे तुम पर पुरा यकीन भी है। कि तुम मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगे। यदि छोड़ भी दिया तो क्या? बुलाने पर तो आओगे। तुम मेरे हो और मेरे ही रहोगे। ------निवेदिता चतुर्वेदी

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जी ईश्वर पर ही ये कविता समर्पित है

राजेश साहू
18 अप्रैल 2015

ईश्वर ही है शायद जिस पर ये कविता पूर्णतः समर्पित है

मेरी रचना पसंद करने क लिए धन्यबाद ओम प्रकाश जी , आपकी बातें मेरी धयान में रहेगी , और मैं जरूर माँ , देश प्रेम आदि पैर लिखूंगी ............

निवेदिता जी,
नि:संदेह आपकी लेखनी में अभिव्यक्ति की क्षमता परिलक्षित होती है. ऐसा प्रतीत होता है कि यदि आप 'देश प्रेम', 'माँ', 'मनुष्य', 'ईश्वर' आदि विषयों पर तुलनात्मक रूप से बेहतर लिख सकती हैं. प्रयत्न करिए, हम आशा करते हैं कि 'शब्दनगरी' से जुड़े अनेक पाठक आपके लेख पसंद करेंगे.
धन्यवाद !

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