“मुक्तक”

06 जुलाई 2018   |  महातम मिश्रा   (58 बार पढ़ा जा चुका है)

मापनी-२१२२ २१२२ २१२२ २१२


“मुक्तक”


समांत- आने पदांत – के लिए


घिर गए जलती शमा में मन मनाने के लिए।

उड़ सके क्या पर बिना फिर दिल लगाने के लिए।

राख़ कहती जल बनी हूँ ख्वाइसें इम्तहान में-

देख लो बिखरी पड़ी हूँ पथ बताने के लिए॥-१


समांत- आम पदांत – अब


कौन किसका मानता है देखते अंजाम सब।

उड़ रहे हैं आ पतिंगे प्रेम का परिणाम रब।

नयन तो सबका सजग है देखता कोई नहीं-

बिन पिए ही गिर रहे हैं कह शमा लव जाम कब॥-२


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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