जीना इसी का नाम है......

06 जुलाई 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (110 बार पढ़ा जा चुका है)

व्यक्ति क्या चाहता है, सिर्फ दो पल की खुशी और दफन होने के लिए दो गज जमीन, बस... इसी के सहारे सारी जिन्दगी कट जाती है। तमन्नाएं तो बहुत होती है, पर इंसान को जीने के लिए कुछ चन्द शुभ चिन्तक की, उनकी दुआओं की जरूरत होती है।आज सभी के पास सब कुछ है मगर नही है तो बस, बात करने के लिए अपने लोग कुछ पल उनके बेशकीमती समय के। वैसे तो मन बहलाने के अनेक संसाधन उपलब्ध है।आज के दौर मे आदमी बस भागे ही जा रहा है, अगर रात ना हो तो वो चौबीस घंटे बेपनाह भागता ही रहे।शुकून इंसान की उम्र बढा देता है।वो यह नही चाहता कि सारी दुनियां उसकी गुलाम बने या सारी दुनियां मुझे पहचाने। बस इतना चाहता है कि अपने आस पास मे उसे जाना जाए जिस समाज मे उसका डेरा है।स्वाभाविक है बुराई भलाई दोनों ही मिलती है।जरूरी नही, आप सभी के भले बने रहे।बुराई आपको तनिक भी स्पर्श ना करे.... ये धारणा सौ फीसदी ससत्य है कि जैसे खुशी गम, दुख सुख एक ही सिक्के के दो पहलू है उसी तरह अच्छाई बुराई एक दूसरे की हम जोली है। एक दूसरे की परछाई है। अगर आपकी कोई अच्छाई करता है तो धीरे से नजदीक बैठे व्यक्ति के कान मे वो आपकी बुराई उडेल देगा।और अगर आपकी कोई बुराई करता है तो पीठ पीछे आपकी भलाई के पुल बांधने से भी नही चूकता।हम सामाजिक प्राणी है । ऐसे बहुत ही कम इंसान होते है जो आपके सामने भलाई बुराई का व्याख्यान ना करे।यह भी सत्य है जैसी इंसान की फिदरत होती है वो वैसा ही अपने नजरिए के चश्मे से देखताहै, और परखता है। व्यक्ति को ज्यादा किसी की कही बातो के तीन तेरह के चक्कर मे नही पडना चाहिए। अधिकांशतः इंसान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के अनुरूप दुसरो को भला बुरा बनाता है।आज जमाना वो है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन मे अजीब सी कशमकश चल रही है। वो एक लक्ष्यहीन दिशा मे बेशक भागे जा रहा है।सत्य है दुसरो से आगे निकलने के चक्कर मे वो अपने सगे संबंधियों को पीछे धकेल रहा है क्योकि आज उसकी सफलता प्राप्ति मे छल कपट समाया हुआ है।लेकिन इस स्थिति मे व्यक्ति कया करे?? वो ऐसे घनचक्कर मे पड गया है प्रसिद्धि उसके जीवन परिवार नाते रिश्तो से बढकर हो गई है।जिन्दगी का एक अहम अंग बन गई हैंं । और क्यो ना हो ??? , सभी चमकते सितारो को सभी सलाम करते है।कभी आपने टूटते तारो को या डूबते सूरज को कभी नतमस्तक करते देखा । और कभी किया भी है तो उससे पिण्ड छुडाने के लिए कि कही कुछ अनर्थ ना हो जाए। इंसान पहले भी दोगला था लेकिन आज कुछ ज्यादा ही डिप्लोमेसी खेलने लगा है।मुंह मे राम बगल मे छुरी वाला काम करता है।अपनो को नीचा दिखाने मे उसे बडा मजा आता है।असफलता पर कुटिल मुस्कान उसके अधर पर खेलती है।और हारे व्यक्ति को ऐसे सांत्वना शब्दों से ऐसे ढांढस बंधाता है जैसे सबसे ज्यादा सगा वो ही है, सच्चा हितैषी , शुभचिन्तक। आज अधिकतर जीत की भीड मे शामिल होना चाहते है।हारने वालो को घास भी नही डालते।अगर दिखावे के लिए उसे साथ मे ले भी लिया तो ऐसा एहसान तले दबाते है कि वो शर्मसार होकर खुद ही अपने आप को अलग थलग कर देता है।और सत्य भी कहा गया है कि ।बरात मे तो सभी आगे चलते है लेकिन मुर्दो के पीछे- पीछे।खैर..... दुनियां बडी ही दुरंगी है।हर पल गिलहरी की तरह रंग बदलते व्यक्ति के मुखौटा है, कब वो मौका पाकर गिद्ध की ऑखे गढा वो बाज की तरह झपट्टा मारकर आपका अहित कर दे।कोई भरोसा नही।ऐसे मे जिन्दगी इतनी बोझिल हो जाती है ,नीरस लगने लगती है।दिन होता है तो शाम काटना मुश्किल हो जाता है.....बोझिल दिन से रात मे ही छुटकारा मिलता है.... इंसान चाहता है कभी उजियारा हो ही नही.... सच का सामना करने , संघर्षों से जूझना नहीं चाहता।लेकिन व्यक्ति को हमेशा आशावादी बनकर एक नई शुरूआत के साथ सुखमय जीवन की नये दिन के स्वागत के साथ करना चाहिए।क्या पता खुशियाँ अपना दामन फैलाएं दोनों हाथों से आपका स्वागत करने के लिए आपके द्वार पर आतुर हो। लेकिन फिर भी आज संतोषी प्रवृति कम होती जा रही है।सब्र का बांध टूटता जा रहा है।और कितना धैर्य रखा जाये ..... साल दर साल गुजरते जाते है ।पता ही नहीं चलता लेकिन दिन गुजारना मुश्किल पड जाता है । ऐसे मे थकहार कर इंसान अपने बनाए घरोंदे मे बैठकर चिन्तन करने लगता है । वो कुम्हार की तरह फिर से एक नए सिरे से जीवन को नया आकार देकर जीना चाहता है।जीवन की भट्टी को संघर्षों की अग्नि में तपाकर खरा सोना बनाना चाहता है।जीवन में सुख दुख समंदर के जवार भाटे की तरह होते है।अविरल, शांत नदी के बहाव की तरह अपने जीवन को रफ्तार दो। रूकना उसका काम नही, क्योकि रूकी तो दलदल बनी।इसी तरह जीवन मे आने वाली रुकावटों से बहती नदी की तरह रास्ते बनाते हुये चलते रहना चाहिए।क्योंकि स्थिरता काबलियत में जंग लगा देती है।यह भी सही है कि प्रत्येक व्यक्ति मे अच्छाई बुराई दोनों ही होते है।क्योंकि दोनों की कीमत एएक दूसरे की मौजूदगी मे ही आंकी जाती है। अवगुण व्यक्ति को मात दे देते है।उनका परिमार्जन कर एक सुलझी , सीधी सादी जिन्दगी बसर करना चाहता है। फरेब या झूठ की वैशाखी पर खडी की गई सफलता की ईमारत कभी भी ढह सकती है।व्यक्तित्व इंसान की पहचान बनाता है । उसके कार्य करने के ढंग उसके व्यक्तित्व का आईना होते है।इसलिए अपने व्यक्तित्व के बल पर वह पूरी दुनियां पर अपनी हुकूमत कर सकता है। समय किसी की परवाह नही करता।इस अमूल्यवान रत्न की परख कर , उसका सदुपयोग करना चाहिए। क्योंकि गुजरा वक्त और मुंह से निकली बात, धनुष से छोडा तीर कभी वापस नही आते।फिर जिन्दगी भर हाथ मलते रहने के सिवा कुछ नही होता।जिन्दगी भर पश्चाताप करते रहते है और उनके पीपीछे भागते रहते है और वो दूर चले जाते है। यह सौ फीसदी सच है वक्त के साथ ना चलकर जब हम अपने ही हिसार से चलते है तो हम अपना ही अस्तित्व ही विस्मृत कर जाते है।एक नये अस्तित्व की तलाश में अंधी दौड मे, कालचक्र में फसते चले जाते है।बचपन की रंगबिरंगी यादों पर खोखली पर्त चढकर उन्हें बेरंग कर देती है। हसती खेलती जिन्दगी मे विराम चिहन लग जाता है।चहकती हुई जिन्दगी मे आधुनिकता का शोर शराबा भर जाता है।नये रिश्ते बनते जाते है और अपने सगे संबंधी, नाते रिश्तो पर धूमिल पर्त चढ जाती है।दर्द मुस्कराहटो मे ढापे लोगो के बीच मे अभिन्न हो जाते है। दिखावे की खुशहाल जिन्दगी का मोलभाव होने लगता है, लेकिन इस अनमोल जिन्दगी के अनूठे रिश्तों को अपर्याप्त निर्वाह करने की कबायत भी मुस्कुराते हुये करता है।कहने का बस, इतना सा तात्पर्य है कि जीवन जीने की कला सीखिए एक कलाकार की तरह अपने हुनर से सभी को बांधे रखिए।

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