भ्रमजाल

09 जुलाई 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

कैसे- कैसे भ्रम पाल रखे हैं. .... सोते से जाग उठी ख्याली पुलाव पकाती उलझनों में घिरी मृतप्राय जिन्दगी में दुख का कुहासा छटेगा जीने की राह मिलेगी बोझ की गठरी हल्की होगी जीवन का अल्पविराम मिटेगा हस्तरेखा की दरारें भरेगी विधि का विधान बदलेगा उम्मीद के सहारे नैय्या पार लग जायेगी बचनों मे विवशता का पुल बनता सिसकियों के बीच कुलांचे मारती यादों में निराशा आशा में तब्दील होगी दुख की आधी में सुखद हवायें बहेगी सोच की परिधि में सपने बिलबिलाते संशय का कीडा कुलबुलाता भस्म ना कर पाई भ्रमित मन को भ्रम और सच के बीच होता एक झीना सा पर्दा समझकर भी, फिर भी, भ्रम का मकडजाल बुनती रही, उलझती रही

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