"विमोहा छंद मुक्तक"

10 जुलाई 2018   |  महातम मिश्रा   (112 बार पढ़ा जा चुका है)

छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - २१२ २१२


"विमोहा छंद मुक्तक"


दृश्य में सार है

आप बीमार हैं

पूछता कौन क्या

कान बेकार है॥-१

आँख बोले नहीं

मौन देखे नहीं

पाँव जाए कहाँ

सार सूझे नहीं॥-२

वेदना साथ है.

आयना सार है।

दाग दागी नहीं-

देखती आँख है॥-३

देख ये बाढ़ है।

चेत आषाढ़ है।

सार डूबे धरा-

तैरना गाढ़ है॥-४

रोक पाते नहीं।

सार जाते नहीं।

मोह माया मिली-

क्रोध भाते नहीं॥-५

नूर नैना भले।

दूर नौका चले।

घाट घावों भरा-

सार छाया पले॥-६

कौन आया गया।

क्या मिला क्या गया।

सार साया लिए-

डोल हौवा गया॥-७

छोड़ जाना नहीं।

सार दाना नहीं।

भूख ज़ोरों लगी-

पेट माना नहीं॥-८

दर्द ऐंठा रहा।

सर्द पैठा रहा।

चींख आती रही-

मर्द बैठा रहा॥-९

खेल खेला नहीं।

गाँव मेला नहीं.

लोग जाते कहाँ-

सार रेला नहीं॥-१०

मोल होता नहीं।

प्यार तोता नहीं।

याद जाती कहाँ-

सार सोता नहीं॥-११


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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