मृत्युलोक का सच ---- आचार्य अर्जुन तिवारी

10 जुलाई 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (34 बार पढ़ा जा चुका है)

मृत्युलोक का सच ---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)


!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *यह संसार परिवर्तनशील है ! यहाँ कभी भी कुछ भी एक जैसा न रहा है और न ही रहेगा | नित्यप्रति परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है | जिस प्रकार प्रात:काल सूर्योदय होता है और दिनभर सारे संसार को प्रकाशित करने के बाद वह पुन: समयनुकूल अपने पीछे एक गहन अन्धकार अस्ताचल में चला जाता है , उसी प्रकार इस संसार के प्रत्येक जड़ - चेतन एक निश्चित अवधि लेकर इस संसार में आये हैं , समय पूर्ण होने पर उनका जाना निश्चित है | यहाँ कोई भी रह नहीं पाया है | इतिहास / पुराणों पर दृष्टि डाली जाय तो एक से एक महान दैत्य हुए जिन्होंने किसी न किसी प्रकार से अमरता का वरदान भी प्राप्त किया परंतु क्या वे अमर हो सके ?? उन्हें भी किसी न किसी कारणवश इस संसार से जाना पड़ा | जहाँ हम निवास कर रहे हैं उसे मृत्युलोक कहा जाता है जिसका सीधा सा अर्थ है :- "मौत का घर" ! इस मृत्युलोक में जो भी आया वह काल से बच नहीं पाया है | मरना सबको एक दिन है , यह बात जो समझ गया उसका जीवन आज सार्थक होकर अमर हो गया और जो स्वयं को ही श्रेष्ठ मानता रहा वह अपना जीवन एवं जीवन का उद्देश्य नष्ट करके पतित होकर चला जाता है | ऐसे लोग जीवन भर तो उपेक्षित रहते ही हैं और मृ्त्योपरांत भी सम्मान नहीं पाते | यह संसार एवं इसका नियम इतना सुदृढ है कि इसके नियमों से कोई भी बच नहीं पाया है | समय समय पर भगवान ने या अन्य देवी - देवताओं ने भी अपने अंश सहित इस धरा पर अवतरित हुए वे चाहते तो अमर ही रहते परंतु सृषेटि के नियम के अन्तर्गत उन्हें भी एक निश्चित अवधि यहाँ व्यतीत करके इस मृत्युलोक को छोड़कर जाना ही पड़ा है | यहाँ कोई भी स्थिर नहीं रह पाया है | स्थिर है तो मात्र उनके कर्मों की व्याख्या |* *आज चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई है | आज का मनुष्य "एको$हं द्वितीयो नास्ति" की भावना से ओतप्रोत दिख रहा है | अधिकतर लोग ऐसे कर्म कर रहे हैं जैसे कि उन्हें इसी संसार में ही रहना है | मनुष्य का चित्त चंचल तो होता ही है , इसी चंचलता के चलते आज मनुष्य का चित्त उसके वश में नहीं रह गया है ऐसा उसके कृत्यों से लगता है | आज स्थिरभाव की कमी झलक रही है | मनुष्य काम , क्रोध , मद , लोभादि से इस तरह ग्रसित हो गया है कि क्या करना चाहिए और क्या त्याज्य है इसका आंकलन वह समय रहते स्वयं करने में अक्षम हो रहा है | ऐसा नहीं है कि ये काम क्रोध मद लोभ पहले नहीं थे ! ये सदा से थे और रहेंगे , परंतु इसी धरा धाम पर इन पर विजय प्राप्त करने वाले भी हुए हैं | आज हम यह जानते हैं कि यह जीवन स्थायी नहीं है एक न एक दिन जाना ही है परंतु फिर भी हम प्रेम का वितरण किन्हीं कारणों से नहीं कर पा रहे हैं | एक एक क्षण मनुष्य की अक निश्चित आयु का क्षरण हो रहा है , इसको हमें ध्यान देना होगा | परंतु हम इसे जानकर भी मानना नहीं चाहते | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह कहना चाहता हूँ कि जिस दिन मनुष्य यह मान लेता है कि यह मानव शरीर एक किराये की कोठरी है और किराया पूरा हो जाने मकानमालिक द्वारा यह कोठरी रूपी मानव शरीर वापस ले लिया जायेगा , उसी दिन से मानव की दिशा एवं दशा परिवर्तित हो जाती है और वह ऐसे कार्यों में स्वयं को लिप्त करने का प्रयास करने लगता है कि उसके कारण किसी को कोई कष्ट न हो |* *हम सभी को यह मानकर चलना चाहिए कि यह जीवन क्षणभंगुर है ! इस अनमोल जीवन का मूल्य समझना ही होगा ! तभी यह जीवम सार्थक हो सकता है |*

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