महिला सशक्तिकरण

12 जुलाई 2018   |  राशि गुप्ता   (168 बार पढ़ा जा चुका है)

महिला सशक्तिकरण वह प्रक्रिया है । जिसकी मदद से महिलायें और अधिक जागरूक तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग हुई है। किसी समय अपने आप को घुघंट के अन्दर काढ़ कर और घर की चहारदीवारी के भीतर पुरुषों के आदेश पालन को अपना जीवन समझने वाली महिलाएँ आज इस वर्तमान समय में पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़ी है, किंतु महिला सशक्तिकरण को पूर्णता देने के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि समाज से सबसे पहले उनके अधिकरो और मूल्यों का अन्त करने वाली राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहज प्रथा , यौन शोषण, अशिक्षा, भ्रूण हत्या, असमानता महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, कार्य स्थल पर यौन शोषण , बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति, मानव तस्करी और एसे अन्य विषय जो महिला उत्थान को पीछे धकेलता है। उपरोक्त सभी स्थितियों पर अंकुश लगाने के साथ यह अत्यन्त आवश्यक है की प्रत्येक व्यक्ति को महिला सशक्तिकरण का वास्तविक उद्देश्य सदेव स्मरण रखना अत्यन्त आवश्यक है। अतः माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा महिला दिवस पर कही गई बात एक शाश्वत सत्य है की “देश की तरक्क़ी के लिये महिलाओं को सशक्त बनाना होगा। “ यह कथन महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिये एक उत्तम सोच को दर्शाता है और महिलाओं को स्वयं के उत्थान के लिये प्रेरित करने की उर्जा देता है। महिला सशक्तिकरण वर्तमान भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिये अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि एक सशक्त महिला ही एक उत्तम घर समाज की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान देती है। अपितु ये कहना भी अनुचित नहीं होगा की एक सशक्त और शिक्षित महिला ही उत्तम समाज की स्थापना की नींव बन सकती है । यदि वर्तमान युग की परिस्थितियों पर विचार करें तो एक सशक्त और शिक्षित महिला जो तटस्थ रूप से सोचने की क्षमता रखती वह समाज के नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रखती है। परन्तु महिला सशक्तिकरण आज भी अपने चरम पर नहीं है आज भी ग्रामीण क्षेत्रों मे महिलाओं की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। अनेक ग्रामों की तो यह स्थिति है की प्रधान के पद पर कागजी दस्तावेज़ों मे तो महिला है परन्तु प्रधानी पर वर्चस्व तो वहां के पुरुषों ने कर क्योंकि उनमें अहंकार का बीज इतना प्रबल है की वह सभी आज भी अपने अंहकार के दंभ के आगे आज भी एक महिला की नीति कुशलता पर सन्सय लगाते है और ग्राम मे महिला सशक्तिकरण केवल कागजी दस्तावेज़ बनकर रह जाते है। अतः यह अत्यन्त आवश्यक है की ग्रमीण क्षेत्रों की महिलाएँ भी परस्पर सशक्त होए। उन्हे भी अपने अधिकारों का पूर्ण भान होना अत्यन्त आवश्यक है जब तक ग्रमीण क्षेत्रों की महिलायें पूरी तरह से सशक्त नहीं तबतक महिला सशक्तिकरण को पुरता प्राप्त नहीं होगी अतः ग्राम की महिलाओं को सशक्त बनाने के क्षेत्र भारत वर्ष को सतत प्रयासरत रहना पड़ेगा तभी यह भारत वर्ष पुनः अपनी सनातन संस्कृति “यत्र नार्यस्तु पुजय्ते रम्न्ते तत्र देवता” को प्राप्त कर सकेगा।

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