एलआईसी की आईडीबीआई में बढ़ती हिस्सेदारी , बीमा धारकों के लिए परेशानी का सबब क्यूँ ?

15 जुलाई 2018   |  Mraman Giri   (65 बार पढ़ा जा चुका है)

एलआईसी की आईडीबीआई में बढ़ती हिस्सेदारी , बीमा धारकों के लिए परेशानी का सबब क्यूँ ?

बीते 30 जून को हैदराबाद में इरडा ( इन्सुरेंस रेग्युलेटरी डेवलोपमेन्ट ऑथारिटी ऑफ इंडिया ) की हुई बोर्ड मीटिंग में सरकार के उस फैसले को मंजूरी मिल गयी जिसमें सरकारी बैंक आईडीबीआई में जीवन बीमा निगम (एलआईसी ) की हिस्सेदारी बढ़ाकर 51 ℅

करने की बात कही गयी थी । ध्यान रहे आईडीबीआई बैंक में एलआईसी की 51 % हिस्सेदारी के बावजूद उसे मैनेजमेंट कन्ट्रोल नहीं सौंपा गया का । मौजूदा समय में एलआईसी की आईडीबीआई में महज़ 10 ℅ की इक्विटी है और बीमा नियामक रेग्युलेटर के अनुसार ,किसी भी इन्सुरेंस कंपनी को पीएसयू में अपनी हिस्सेदारी 15 प्रतिशत तक रखने का प्रावधान है , यदि इन्सुरेंस कंपनी 15 प्रतिशत से अधिक अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है तो उसे इरडा ( इन्सुरेंस रेग्युलेटरी डेवलोपमेन्ट ऑथोरिटी ) की विशेष मंजूरी लेनी पड़ती है ।

फिलहाल बीमा नियामक रेग्युलेटर के इस फ़ैसले के कई निहितार्थ निकाले जा रहें है । एक तरफ सरकार जहां एलआईसी को , आईडीबीआई में नियोजित निवेश (स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट) के ज़रिए बैंकिंग सेक्टर में उतरने की दलील दिए जा रही है ,वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञ एवं आलोचक इस बात को लेकर हैरान हैं कि आखिर जो आईडीबीआई बैंक पिछले दो सालों से अपने 17000 करोड़ के घाटे के चलते आरबीआई के पीसीए( प्रोम्ट करेक्टिव एक्शन ) की लिस्ट में टॉप पर है , अगर रकम के लिहाज़ से देखें तो वर्तमान में बैंक के पास लगभग 55 हज़ार करोड़ का गैर निष्पादित संपत्ति (N.P.A) है , जो कि अबतक आईडीबीआई बैंक के अपनी कुल जमा का 28 प्रतिशत ग्रॉस एनपीए हो चुका है , ऐसे में सरकार का ये सोचना की एलआईसी के इस निवेश से आईडीबीआई बैंक को अपनी घाटे की मौजूदा स्थिति से उबरने में मदद मिलेगी , एक अतिशय आशावादी दृष्टिकोण लगता है ।


ऐसे में विशेषज्ञों की चिंता सरकार के इस अतिशय आशावादी फ़ैसले से कहीं अधिक इस बात को लेकर है कि क्या सरकार जीवन बीमा निगम के बीमा धारकों के पैसों से आईडीबीआई बैंक के घाटे को कम करने की कवायद करेगी ?


ध्यान रहे कि ये वही आईडीबीआई बैंक है जिसकी एनपीए लिस्ट में विजय माल्या(900 करोड़ ) से लेकर एयरसेल के शिव शंकरन ( 600 करोड़ ) एवं उन तमाम मछली पडकड़ने वाली कंपनियों को पैसा उस जमीन के एवज में दिया गया जो मौजूद ही नहीं थी , ऐसे में बीमा धारकों की चिंता बैंक की साख को लेकर जायज़ दिखती है ।


प्रायः इससे पहले भी भारतीय जीवन बीमा निगम , कई बार सरकारी बैंकों की कर्ज़ से उबरने में मदद कर चुकी है , अगर आकड़ो पर गौर करें तो एलआईसी की फिलहाल 21 सरकारी बैंकों में 1 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी रही है परंतु सिर्फ़ विजया बैंक , इंडियन बैंक एवं स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को छोड़कर उसको हर बैंक से घाटा ही उठाना पड़ा । कोटक इंस्टिट्यूट इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक एलआईसी ने 2014-15 में सरकारी बैंकों में 1850 करोड़ और 2015-16 में 2539 करोड़ रुपये लगाए थे ।

इस पूरे मसले को लेकर सरकार की जो दलील है वो ये की एक ओर आईडीबीआई बैंक में स्ट्रेटेजिक निवेश के ज़रिए जहाँ एलआईसी बैंकिंग सेक्टर में उतर पाएगी वहीं दूसरी तरफ उसे अपनी पालिसी बेचने हेतु आईडीबीआई के 1995 ब्रांचो का एक वृहद चैनल मिलेगा । तो वहीं कंपनी वैल्यूएशन के ज़रिए आईडीबीआई को भी अपनी घाटे की स्थिति से उबरने का मौका मिल जाएगा । पर विशेषज्ञों की माने तो जिस एलआईसी के पास 30 करोड़ पालिसी होल्डर एवं 35 करोड़ पॉलिसी हो जिसके प्रीमियम की वैल्यू 3 लाख करोड़ प्रतिवर्ष हो , उसे एक ऐसे डिस्ट्रीब्यूशन चैनल की जरूरत हो जिसकी खुद की ब्रांच एलआईसी की मौजूदा ब्रांच (2049 ) से कम हो , सरकार की यह दलील गले से नीचे नहीं उतर रही है । वहीं दूसरे यदि एलआईसी को बैंकिंग सेक्टर में उतारना ही है तो वो खुद किसी नए बैंक के माध्यम से आरबीआई की अनुमति लेकर उतर सकती है , ऐसे में पीएसयू बैंकों के ज़रिए एलआईसी का बैंकिंग सेक्टर में आना , जिसके साथ निवेश का अनुभव एलआईसी का घाटे का ही रहा , खुद सरकार की दलील को कमज़ोर बनाती है ।


फिलहाल इरडा ( बीमा नियामक प्राधिकरण ) द्वारा इस फैसले को मंजूरी मिल गयी है अब आगे की प्रक्रिया चाहे वो एलआईसी के बोर्ड मेंबर की मंजूरी हो या कैबिनेट की मंजूरी , महज़ औपचारिकता रह गयी है । अब आने वाले समय मे देखना ये है कि क्या सच में सरकार का ये अतिशय आशावादी कदम , एलआईसी के बीमा धारकों एवं आईडीबीआई बैंक के लिए ये एक प्रॉफिट गेनिंग साबित होगा ।

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