“हाइकु”

18 जुलाई 2018   |  महातम मिश्रा   (73 बार पढ़ा जा चुका है)

“हाइकु”


कुछ तो बोलो

अपनी मन बात

कैसी है रात॥


सुबह देखो

अब आँखें भी खोलो

चींखती रात॥


जागते रहो

करवट बदलो

ये काली रात॥


टपके बूंद

छत छाया वजूद

भीगती रात॥


दिल बेचैन

फिर आएगी रैन

जागती रात..


महातम मिश्र , गौतम गोरखपुरी


अगला लेख: “चतुष्पदी”सुना था कल की नीरज नहीं रहे।



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
23 जुलाई 2018
छंद- दुर्मिल सवैया (वर्णिक ) शिल्प - आठ सगण सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२"दुर्मिल सवैया"हिलती डुलती चलती नवका ठहरे विच में डरि जा जियरा।भरि के असवार खुले रसरी पतवार रखे जल का भँवरा ।।अरमान लिए सिमटी गठरी जब शोर मचा हंवुका उभरा।ततक
23 जुलाई 2018
10 जुलाई 2018
छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - २१२ २१२"विमोहा छंद मुक्तक"दृश्य में सार हैआप बीमार हैं पूछता कौन क्या कान बेकार है॥-१ आँख बोले नहीं मौन देखे नहीं पाँव जाए कहाँ सार सूझे नहीं॥-२ वेदना साथ है. आयना सार है। दाग दागी नहीं- देखती आँख है॥-३ देख ये बाढ़ है। चेत आष
10 जुलाई 2018
05 जुलाई 2018
“कुंडलिया”पढ़ते-पढ़ते सो गया भर आँखों में नींद। शिर पर कितना भार है लगता बालक बींद॥लगता बालक बींद उठाए पुस्तक भारी। झुकी भार से पीठ हँसाए मीठी गारी॥कह गौतम कविराय आँख के नंबर बढ़ते। अभी उम्र नादान गरज पर पोथी पढ़ते॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी
05 जुलाई 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x