प्रकृति और इंसान

18 जुलाई 2018   |  कामिनी सिन्हा   (165 बार पढ़ा जा चुका है)




नदी,सागर ,झील या झरने ये सारे जल के स्त्रोत है. यही हमारे जीवन के आधार भी है. ये सब जानते और मानते भी है कि " जल ही जीवन है." जीवन से हमारा तातपर्य सिर्फ मानव जीवन से नहीं है. जीवन अर्थात " प्रकृति " अगर प्रकृति है तो हम है .लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या हम है ? क्या हम जिन्दा है? क्या हमने अपनी नदियों, तालाबों को ,झरनो ,समंदर को ,हवाओ को, धरती माँ तक को जिन्दा छोड़ा है? इन्ही से तो हमारा आस्तित्व है न .अपनी भागती दोड़ती दिनचर्या को एक पल के लिए रोके और अपनी चारो तरफ एक नज़र डाले और दो घडी के लिए सोचे हमने खुद अपने ही हाथो अपनी प्रकृति को यहाँ तक की अपने चरित्र तक को कितना दूषित कर दिया है.

इन दिनों मुझे मुंबई महानगर में वक़्त गुज़ारने का मौका मिला . " मुंबई " जिसकी खूबसूरती सिर्फ और सिर्फ समंदर से है लेकिन उसकी दुर्दशा जो हमने देखी तो दिल ही नहीं आत्मा तक तड़प उठी .समुन्दर का पानी बिलकुल काला पड़ा है .एक दिन बहुत तेज़ बारिश की वजह से समुंद में हाई टाइड उठा सड़क तक पर पानी आ गया . उन तेज़ लेहरो के साथ कई टन कचरा बाहर आ कर सड़को पर फैल गया जिसको साफ़ करने में मुंबई सफाई कर्मियों को काफी मसक्त करनी पड़ी उन कचरो को देख ऐसे लग रहा था जैसे अब समुन्द्र भी थक चूका है उसमे भी अब सहन शक्ति नहीं बची हमारी गंदगियों को उठाने की. वो हमारा फेका कचरा हमे ही वापस कर रहा है .उन कचरो के बीच समुंद्री जीवो की क्या दुर्दशा होगी शायद हम नहीं समझ सकते .गंगा तो पहले ही हम से थक कर हार मान चुकी है .जब बड़ो का ये हाल है तो बेचारे छोटे छोटे नदी तालाब अपना आस्तित्व कहाँ बचा पाते वो तो कब के हमे छोड़ चुके है.

अब बात करते है हवा की तो दिल्ली वालो से पूछे हवाओ का हाल - चाल . वहा तो वायु प्रदूष्ण अपने सारे सीमाओं को पार कर चूका है. बच्चे बच्चे के फेफड़े में जहर भर चूका है साँस लेना भी दूभर है .मास्क लगा के घूमने के वावजूद शायद ही कोई हो जिसे साँस की बीमारी न हो. बात करते है धरती माता की तो मैदानी इलाका तो छोड़े पहाड़ो तक पर भी जहा इंसान का पहुंचना तक मुश्किल था वहां भी पहुंच कर हम इंसानो ने इतनी गंदगी फैलाई कि धरती माँ कराह उठी और अपना गुस्सा ऐसे प्रलय के रूप में दिखाई कि शायद ही कोई बद्रीनाथ और केदारनाथ के जल प्रलय को भूल पाए. ऐसा नहीं है कि छोटे शहर इस प्रदूष्ण से अछूते है .लेकिन यह हम बड़े बड़े कारनामो का जिक्र इसलिए कर रहे है कि जब बड़ो का ये हाल है तो छोटे शहरों को कौन पूछता है.

ये तो हवा पानी का हाल हुआ अब जीवन की तीसरी सब से बड़ी आवश्य्कता " भोजन " उसका क्या हाल कर रखा है हमने .आये दिन खबर आती है कि आटा चावल तक में प्लास्टिक इस्तमाल किया जा रहा है ,फल और सब्जी तक जेहरीले खाद और इंजेक्शन के द्वारा उपजाए जा रहे है .पिछले दिनों एक विडिओ वायरल हुआ था जिस में दिख रहा था कि झींगा ( prawn ) तक का वजन बढ़ने के लिए इंजेक्सन के द्वारा उसमे सीमेंट का पानी इंजेक्ट किया जा रहा है. क्या खा रहे है हम अन्न या जहर .

अब " चरित्र " की बात करे तो इंसानीचरित्र ही इंसान को जानवरो से अलग करता है. परन्तु इंसानी चरित्र के दूषित होने की तो इंतहा ही हो गई है. ऐसा शायद ही कोई दिन हो जब हमे इंसान के चरित्र के गिरने और ज्यादा गिरने की घटना सुनने को ना मिलती हो .हवस ने बाप-बेटी ,भाई-बहन तक के रिश्ते को अपवित्र कर रखा है तो लालच ने बाप-बेटे और भाई-भाई तक को एक दूसरे का क़त्ल करने पर उकसा रखा है. हर सुबह जब आँख खुलती है तो भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि आज कोई इंसानियत के गिरने की घटना सुनने को ना मिले .


इन सारे प्रदूष्ण के पीछे किसका हाथ है ? कौन है जो हमारे जल, हमारी हवा ,हमारे भोजन और यह तक की हमारे चरित्र तक को प्रदुसित कर रहा है ? अब हमे भी इस पर एक बार बिचार करना चाहिए क्योकि ये सारे प्रदूष्ण अपनी सारी हदे पार कर चूका है. हम हर वक़्त सरकार को दोष देते है .अपने दिल पर हाथ रख कर खुद से एक सवाल करे क्या इसके लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार है ?हां, सरकार भी है क्यूकि सरकार कोई दूसरी दुनिया से आये लोग नहीं है वो भी हममे से एक इंसान ही है और उनका पूरा कसूर है .हम इंसानो ने ही ये सारा प्रदूष्ण फैलाया है अपने अपने स्वार्थ में लिप्त हो कर, अपनी अपनी जिमेदारियो से मुँह मोड़ कर ,अपना कर्त्वय सच्चे दिल से पूरा न करके . हम इंसान से जानवर ही नहीं बल्कि वहशी दरिंदे बन गए है. अब भी वक़्त है,प्रकृति हमे बार बार चेतावनी दे रही है .अगर हम अभी नहीं सभलें तो अगली पीढ़ी का हाथ हमारे गेरबान पर होगा .वो हमसे सवाल करेंगे कि हमने क्या उनके लिए यही धरोहर छोड़ा है और हम मुँह दिखने के लायक नहीं रहेंगे .मेरा 5 साल का भतीजा जब अपनी माँ को पानी बिखेरते देखा तो बोल पड़ा " सारा पानी आप सब ही खत्मकर दो जब हम बड़े होंगे तो हमारे लिए पानी ही नहीं बचेगा " उस बच्चे के सवाल ने हमे लज्जित किया. अगर अब भी हम अपने दायित्यो का निर्वाह अपनी क्षमता अनुसार भी कर लेगे तो अगली पीढ़ी को मुँह दिखने लायक रहेंगे .

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अलोक सिन्हा
18 जुलाई 2018

यह बहुत ही अच्छा लेख है आपका |

बहुत बहुत धन्यबाद

Shashi Gupta
19 जुलाई 2018

जी बिल्कुल नयी पीढ़ी जवाब मांगेगी। बढ़िया विषय उठाया

बहुत बहुत धन्यबाद

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