कारवाँ गुज़र गया... पद्म विभूषित हिंदी साहित्यकार, कवि, लेखक और गीतकार गोपालदास सक्सेना 'नीरज' का निधन ।

19 जुलाई 2018   |  शब्दनगरी संगठन   (222 बार पढ़ा जा चुका है)

कारवाँ गुज़र गया... पद्म विभूषित हिंदी साहित्यकार, कवि, लेखक और गीतकार गोपालदास सक्सेना 'नीरज' का निधन ।

इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में

तुमको लग जाएंगी सदियां इसे भुलाने में

न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर,

ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में


अपनी अंतिम सांस तक अपनी कविताओं से हम सब को आत्मविभोर करने वाले कवि गोपालदास नीरज का दिल्ली के एम्स में हुआ निधन । समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक महान कवि पदमश्री गोपाल दास "नीरज" का एम्स में 93 वर्ष की आयु में निधन हुआ ।


गीत ऋषि गोपालदास 'नीरज' जी के दर्शन और श्रवण का सौभाग्य हमें मिला, हम ख़ुशनसीब पीढ़ी के लोग हैं। नीरज की मौत के साथ एक युग का अंत हो गया।


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नीरज की कलम से निकले गीतों के लिए उन्हें तीन बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।


उनके पुत्र शशांक प्रभाकर ने बताया कि आगरा में शुरुआती उपचार के बाद उन्हें बुधवार को दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया था, लेकिन कोशिशों के बावजूद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका। उन्होंने बताया कि उनके पार्थिव शरीर को पहले आगरा में लोगों के अंतिम दर्शनार्थ रखा जाएगा और उसके बाद पार्थिव देह को अलीगढ़ ले जाया जाएगा जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।


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4 जनवरी 1925 को ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के इटावा जिले के पुरावली गाँव में बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना के घर अद्भुत प्रतिभा के धनी गोपालदास सक्सेना 'नीरज' का जन्म हुआ | नीरज ने अपने जीवन में कई उतर चढाव देखे | मात्र 6 वर्ष की आयु में उनके पिता चल बसे | नीरज ने 1942 में एटा से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की। लम्बी बेकारी के बाद दिल्ली जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहाँ से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डी०ए०वी कॉलेज में लिपिक के रूप में काम किया । फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में भी पाँच वर्ष तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएँ देकर 1949 में इण्टरमीडिएट, 1951 में बी०ए० और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिन्दी साहित्य से एम०ए० किया।


कवि होना भाग्य है

नीरज होना सौभाग्य


मेरठ कॉलेज मेरठ में उन्होंने हिन्दी कुछ समय तक प्राध्यापक पद पर अध्यापन कार्य किया था । किन्तु कॉलेज प्रशासन के व्यवहार से कुपित होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये और मैरिस रोड जनकपुरी अलीगढ़ में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे।


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कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को मुंबई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा।


आदमी को आदमी बनाने के लिए,

जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए।

और उसे लिखने के लिए,

स्याही नहीं आँखों वाला पानी चाहिए।


किन्तु बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका जी बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये। तब से आज तक वहीं रहकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अभी भी वे अट्ठासी वर्ष की आयु में भी वे देश विदेश के कवि-सम्मेलनों में उत्साह के साथ शरीक होते थे।


पद्मभूषण से सम्मानित मशहूर कवि, गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने दिल्ली के एम्स में 19 जुलाई 2018 की शाम लगभग 8 बजे अन्तिम सांस ली। अपने बारे में उनका यह शेर आज भी मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता है:


महान कवि श्री गोपालदास ‘नीरज’ जी के महाप्रयाण पर अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ! उनके अमर गीत हमेशा-हमेशा हमारी स्मृतियों में गूँजते रहेंगे...


गीत अश्क बन गए छंद हो दफन

गए साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए

और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके

उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।

कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे...



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मुझे मेरे बचपन में एक कवि सम्मलेन में सुनी एक कविता का कुछ एहसास याद है और लगता है की वह नीरज जी ने पढ़ी थी. ये लगभग ५०-६० साल पुरानी बात है. पहली पंक्ति है " मैंने भी चार नयन करने की ठानी थी" .
क्या कोई इस बारे में कोई रौशनी डाल सकते हैं कि :
- क्या ऐसी कोई कविता है भी या नहीं?
- यदि है तो क्या वह नीरज जी की कलम से है.
धन्यवाद.
वीरेन्द्र गुप्ता

अलोक सिन्हा
20 जुलाई 2018

बहुत आहत हूँ | बड़े भाई थे | सन 1950 से बुलंदशहर घर आते जाते थे | इस द्वार क्यों न जाऊं उस द्वार क्यों न जाऊं घर पा गया तुम्हारा मैं घर बदल बदल कर | यह गीत उनहोंने हमारे घर पर ही लिखा था | हुआ ये कि व ह उस दिन सुबह 5 बजे ट्रैन से बुलंदशहर आये | सर्दी के दिन थे | हमारे घर के आस पास सभी घर एक से नक्शे से बने हैं | जिससे वह अँधेरे मैं घर नहीं पहचान सके | इस तरह कभी किसी घर को हमारा घर समझ लेते कभी किसी घर को | काफी देर जब सफलता नहीं मिली तो उनहोंने फिर बड़े विनोद भाई साहब का नाम द्वार द्वार पर पुकारा तो मां की आँखें खुल गईं और वह फिर उन्हें बुला कर अंदर ले आई | वास्तव में वे अभूतपूर्व प्रतिभा थे | कैरम बहुत अच्छी खेलते थे | खाने में मटठा बहुत पसंद था | मैंने ठीक से दही चलाना उन्हीं से सीखा | आज उनकी सेंकड़ों यादें मन में हैं | पर मैं बिखरे मन को संग्रह नहीं कर पा रहा हूँ | मन शांत हो जाने पर पूरा संस्मरण ही लिखूंगा |

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