“चतुष्पदी”सुना था कल की नीरज नहीं रहे।

20 जुलाई 2018   |  महातम मिश्रा   (90 बार पढ़ा जा चुका है)

सादर नमन साहित्य के महान सपूत गोपाल दास ‘नीरज’ जी को। ॐ शांति।


“चतुष्पदी”


सुना था कल की नीरज नहीं रहे।

अजी साहित्य के धीरज नहीं रहे।

गोपाल कभी छोड़ते क्या दास को-

रस छंद गीत के हीरज नहीं रहे॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "गीत"चैन की बांसुरी बजा रहे बाबा



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
10 जुलाई 2018
मापनी-२१२२ २१२२ २१२२ २१२ समांत- ओल पदांत- दूँ“गीतिका” हो इजाज़त आप की तो दिल कि बातें बोल दूँ बंद हैं कमरे अभी भी खिड़कियों को खोल दूँ उस हवा से जा कहूँ फिर रुख इधर करना कभी दूर करना घुटन मंशा जगह दिल अनमोल दूँ॥ खिल गई है रातरानी महक लेकर बाग की हर दिशा गुलजार करती रंग महफि
10 जुलाई 2018
12 जुलाई 2018
“कुंडलिया”मम्मा ललक दुलार में नहीं कोई विवाद। तेरी छवि अनुसार मैं पा लूँ सुंदर चाँद.. पा लूँ सुंदर चाँद निडर चढ़ जाऊँ सीढ़ी। है तेरा संस्कार उगाऊँ अगली पीढ़ी॥ कह गौतम कविराय भरोषा तेरा अम्मा। रखती मन विश्वास हमारी प्यारी मम्मा॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी
12 जुलाई 2018
18 जुलाई 2018
“हाइकु”कुछ तो बोलो अपनी मन बातकैसी है रात॥सुबह देखो अब आँखें भी खोलो चींखती रात॥ जागते रहोकरवट बदलो ये काली रात॥ टपके बूंद छत छाया वजूद भीगती रात॥ दिल बेचैन फिर आएगी रैन जागती रात.. महातम मिश्र , गौतम गोरखपुरी
18 जुलाई 2018
17 जुलाई 2018
समांत- अही पदांत- है मात्रा भार-२९ १६ १३ पर यति “गीतिका”हर मौसम के सुबह शाम से इक मुलाक़ात रही है सूरज अपनी चाल चले तो दिन और रात सही है भोर कभी जल्दी आ जाती तब शाम शहर सजाती रात कभी दिल दुखा बहकती वक्त की बात यही है॥हरियाली हर ऋतु को भाती जब पथ पुष्प मुसुकाते गुंजन करते
17 जुलाई 2018
30 जुलाई 2018
वज़्न- २२१ १२२२ २२१ १२२२ काफ़िया- अ रदीफ़ आओगे “गज़ल” आकाश उठाकर तुम जब वापस आओगेअनुमान लगा लो रुक फिर से पछताओगेहर जगह नहीं मिलती मदिरालय की महफिल ख़्वाहिश के जनाजे को तकते रह जाओगे॥ पदचाप नहीं सुनता अंबर हर सितारों का जो टूट गए नभ से उन परत खिलाओगे॥इक बात सभी कहते हद में रह
30 जुलाई 2018
16 जुलाई 2018
विधान - २५ मात्रा १३ १२ पर यति यति से पूर्व वाचिक १२/लगा अंत में वाचिक २२/गागा क्रमागत दो-दो चरण तुकान्त कुल चार चरण पर मुक्तक में तीसरा चरण का तुक विषम “छंद मुक्तामणि मुक्तक”अतिशय चतुर सुजान का छद्मी मन हर्षायामीठी बोली चटपटी सबका दिल उलझाया पौरुष अपने आप में नरमी गरमी स
16 जुलाई 2018
16 जुलाई 2018
बह्र- २१२२ २१२२ २१२२ २ काफ़िया- अर रदीफ़- दिया मैंने“गज़ल”क्या लिखा क्योंकर लिखा क्या भर दिया मैंनेकुछ समझ आया नहीं क्या डर दिया मैंनेआज भी लेकर कलम कुछ सोचता हूँ मैंवो खड़ी जिस द्वार पर क्या घर दिया मैंने।।हो सके तो माफ़ करना इन गुनाहों कोजब हवा में तीर थी क्यों शर दिया मैंन
16 जुलाई 2018
26 जुलाई 2018
“मुक्तक” बदला हुआ मौसम बहक बरसात हो जाए। उड़ता हुआ बादल ठहर कुछ बात हो जाए। क्यों जा रहे चंदा गगन पर किस लिए बोलो- कर दो खबर सबको पहर दिन रात हो जाए॥-१ अच्छी नहीं दूरी डगर यदि प्रात हो जाए। नैना लगाए बिन गर मुलाक़ात हो जाए। ले हवा चिलमन उडी कुछ तो शरम करो-सूखी जमी बौंछार
26 जुलाई 2018
14 जुलाई 2018
मृ
भावनाओं का चक्रव्यूह तोड़ स्मृतियों के मकड़जाल से निकल कच्ची छोड़,पक्की डगर पकड़ लालसाओं के खुवाओं से घिराभ्रमित मन का रचित संसार लिए.....रेगिस्तान में कड़ी धूप की जलधारा की भांति सपनें पूरे करने......चल पड़ा एक ऐसी डगर.......अनजानी राहें,नए- लोग चकाचौंध की मायावी दुनियां ऊँची-ऊँची इमारतों जैसे ख्वाब हकीक
14 जुलाई 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x