पाकिस्तान की प्लानिंग: 28 जुलाई को भारत में घुसेंगे, 9 अगस्त को कश्मीर हमारा होगा

20 जुलाई 2018   |  रेखा यादव   (151 बार पढ़ा जा चुका है)

पाकिस्तान की प्लानिंग: 28 जुलाई को भारत में घुसेंगे, 9 अगस्त को कश्मीर हमारा होगा

25 जुलाई, 2018 को पाकिस्तान में चुनाव होना है. पाकिस्तान में लोकतंत्र का पस्त रेकॉर्ड रहा है. ऐसे में यहां कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर ले, तो बड़ी बात है. ये पहली बार हो रहा है कि पाकिस्तान में बैक-टू-बैक दो सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया है. ये जो हुआ है, वो ऐतिहासिक है. इस खास मौके पर द लल्लनटॉप पाकिस्तान की राजनीति पर एक सीरीज़ लाया है. शुरुआत से लेकर अब तक. पढ़िए, इस सीरीज़ की छठी किस्त.



मिर्जा ने पूछा-

‘जुल्फी, तुम्हें तो हिंदुस्तान का साइज मालूम है. पाकिस्तान किसी भी तरह से भारत को नहीं हरा सकता था. तुमने क्या सोचकर ये जंग शुरू की?’

जुल्फी ने जवाब दिया-

‘अयूब को कमजोर करने और उसे हटाने का कोई और तरीका नहीं था.’

ये 1965 की ही बात है. महीना समझिए कि अक्टूबर – नवंबर का रहा होगा. पाकिस्तान के विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो लंदन पहुंचे. उनकी मुलाकात हुई पूर्व राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा से. मिर्जा, जो वहां चुपचाप देशनिकाला भोग रहे थे. ऊपर जो सवाल है, वो मिर्जा ने भुट्टो से पूछा था. भुट्टो ने जो जवाब दिया, वो भी ऊपर लिखा है. दोनों के बीच 1965 के भारत-पाकिस्तान जंग की बात हो रही थी.

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1965 की लड़ाई. भारत और पाकिस्तान की दूसरी लड़ाई. जब पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने की साजिश की. ये साजिश ऐसी थी मानो शतरंज का कोई खिलाड़ी बस अपनी-अपनी चाल सोचकर जीतने के ख्वाब देख रहा हो. इस चाल में मेरा वो वाला प्यादा आगे बढ़ेगा. अगली चाल में मेरा हाथी सीधा जाकर उसके हाथी को मार गिराएगा. उससे अगली चाल में वजीर निकाल लूंगा. और उससे अगली चाल- चेक मेट.

लेकिन वो ये भूल जाता है कि दूसरा खिलाड़ी भी चाल सोच रहा होगा. कि उसका भी चांस आएगा खेलने का. ऐसा ही पाकिस्तान ने किया और मुंह की खाई. 1965 की लड़ाई के चार साल के अंदर-अंदर अयूब का सारा राज-पाट सिमट गया. उनकी छुट्टी हो गई. कहते हैं कि अगर ये जंग न हुई होती और अयूब की सेहत न गिरी होती, तो शायद वो कुछ साल और चलते. कहते तो ये भी हैं कि जुल्फिकार अली भुट्टो ने जान-बूझकर 1965 की जंग करवाई थी. भुट्टो थे अयूब के रक्षा मंत्री. उन्होंने ही पूरा प्रपोजल बनाया था. पूरी साजिश के पीछे उनका ही दिमाग था. भुट्टो ही थे, जिन्होंने अयूब को इस जंग के लिए तैयार किया था.


लाल बहादुर शास्त्री अचानक से प्रधानमंत्री बने थे. उनको देखकर भ्रम हो सकता था कि वो कमजोर होंगे. मगर शास्त्री बहुत दृढ़ निकले. 1965 की ही लड़ाई के समय शास्त्री ने 'जय जवान,जय किसान' का नारा दिया था. कहते हैं कि उनकी अपील पर औरतों ने अपने गहने दे दिए. ताकि युद्ध के लिए फंड जमा किया जा सके (फोटो: Getty)

लाल बहादुर शास्त्री अचानक से प्रधानमंत्री बने थे. उनको देखकर भ्रम हो सकता था कि वो कमजोर होंगे. मगर शास्त्री बहुत दृढ़ निकले. 1965 की ही लड़ाई के समय शास्त्री ने ‘जय जवान,जय किसान’ का नारा दिया था. कहते हैं कि उनकी अपील पर औरतों ने अपने गहने दे दिए. ताकि युद्ध के लिए फंड जमा किया जा सके (फोटो: Getty)

या तो इन पांचों में से कोई बात हो सकती है या पांचों बातें हो सकती हैं
भुट्टो तो नेता थे. उनके छुपे हित होते हैं. बिना सोचे-समझे संवेग में फैसले ले लेते हैं. अक्सर उनको सैन्य मामलों की ज्यादा समझ भी नहीं होती. मगर अयूब के पास तो सेना का बैकग्राउंड था. उन्हें क्यों लगा कि भारत को हराना दाल-भात मसलकर खाने जितना आसान होगा. क्यों लगा उनको कि पाकिस्तान के हमला करने पर भारत खामोश रहेगा और कुछ कर नहीं पाएगा. इसके पीछे चार बातें हो सकती हैं-

1. कश्मीर में हुए तनाव की वजह से पाकिस्तान को लगा कि अब कश्मीर भारत के हाथ से निकल गया है. इसे बस एक धक्का देने की जरूरत है और कश्मीर हमारा.
2. 1962 में चीन के हाथों हुई भारत की हार से पाकिस्तान को लगा कि हिंदुस्तान के बस की कुछ नहीं.
3. पाकिस्तान को लगा कि भारत सबसे ज्यादा कमजोर इसी वक्त है. अभी वार नहीं किया, तो दोबारा चांस नहीं मिलेगा.
4. मई 1964 में नेहरू का इंतकाल हो चुका था. उनकी जगह शास्त्री बने थे प्रधानमंत्री. पाकिस्तान को लगा कि शास्त्री कमजोर हैं. शास्त्री के बारे में अयूब का जजमेंट कुछ यूं था- वो ‘बौना’ आदमी…
5. अयूब को हमेशा से लगता आया था. कि हिंदू कमजोर और डरपोक होते हैं. वो लड़ने के काबिल नहीं होते. अयूब की नजर में हिंदुस्तानी ‘बीमार’ लोग थे. उनके लिए भारत=हिंदू था.

65 की इस लड़ाई के पीछे सबसे ज्यादा किसी का दिमाग खर्च हुआ, तो वो भुट्टो ही थे. उन्होंने अयूब को गारंटी दी कि अगर पाकिस्तान कश्मीर हासिल करना चाहता है, तो उसके पास बस यही आखिरी मौका है. अयूब ने सोचा कि अगर ऐसा हो जाता है, तो वो पाकिस्तान के इतिहास में सबसे बड़े नायक बन जाएंगे. शायद जिन्ना से भी बड़े (फोटो: Getty)

65 की इस लड़ाई के पीछे सबसे ज्यादा किसी का दिमाग खर्च हुआ, तो वो भुट्टो ही थे. उन्होंने अयूब को गारंटी दी कि अगर पाकिस्तान कश्मीर हासिल करना चाहता है, तो उसके पास बस यही आखिरी मौका है. अयूब ने सोचा कि अगर ऐसा हो जाता है, तो वो पाकिस्तान के इतिहास में सबसे बड़े नायक बन जाएंगे. शायद जिन्ना से भी बड़े (फोटो: Getty)

साजिश शुरू कैसे हुई? किसका दिमाग था इसके पीछे?
अब इस बैकग्राउंड से आगे बढ़कर प्लानिंग की तरफ चलते हैं. 1964 में अयूब ने एक ‘कश्मीर पब्लिसिटी कमिटी’ बनाई थी. मकसद था कश्मीर के हालात पर नजर रखना. तब विदेश सचिव रहे अजीज अहमद इसके अध्यक्ष थे. अजीज ने अयूब को बिना बताए दो प्लान तैयार करवाए. एक- संघर्षविराम रेखा के पार, यानी भारत की साइड में गड़बड़ियां पैदा करना. दूसरा, घुसपैठियों को मदद मुहैया करवाना. ये इसी प्लानिंग का नतीजा था कि 1964 के आखिर तक विदेश मंत्रालय (जो कि उस समय भुट्टो के पास था) और ISI ने ऑपरेशन जिब्राल्टर की साजिश रची. 1965 के शुरुआती महीनों में जब ये प्लानिंग अयूब के सामने रखी गई, तब तक अयूब को इसकी भनक तक नहीं थी. कहते हैं कि तब तक अयूब इसके लिए राजी नहीं थे. मगर अयूब के सहयोगी, खासतौर पर भुट्टो और अजीज अहमद बार-बार इस पर जोर देते रहे. वे अयूब को तैयार करने की लगातार कोशिश करते रहे.

कच्छ के रण में जो हुआ, उसने पाकिस्तान का मन बढ़ाया
कच्छ का रण. इसे लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच थोड़ा तनाव था. 1965 की बात करें, तो ये चीज जनवरी से ही शुरू हो गई थी. दोनों देशों की सेना यहां अपने-अपने हिस्से में पट्रोलिंग करती थी. झगड़ा शुरू हुआ, जब दोनों देशों ने एक-दूसरे पर इल्जाम लगाया. कि दूसरे की सेना उनके इलाके में घुसपैठ कर रही है. फरवरी में दोनों देशों के बीच बात भी हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. मार्च आते-आते भारत ने अपने ठीक-ठाक सैनिक यहां भेज दिए. असल में 1962 की लड़ाई के बाद भारत कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था. दोनों देशों की सेनाओं के बीच थोड़ी झड़प हुई. फिर पाकिस्तान की तरफ से संघर्षविराम की अपील आई. चीजें थोड़ी देर के लिए रुक गईं. लेकिन फिर अप्रैल के दूसरे हफ्ते में आकर फिर से झड़पें चालू हो गई.


1962 में चीन के हाथों मिली शर्मनाक हार शास्त्री को विरासत में मिली थी. उस हार के जख्म बहुत ताजा थे अभी. सेना भी सतर्क थी. वो <a href='/Hashtag/desh'>देश</a> को किसी फसाद में नहीं फंसाना चाहती थी. इस लिहाज से देखिए, तो भारत और पाकिस्तान की सेना में स्याह-सफेद जितना अंतर था. इंडियन आर्मी का अप्रोच बहुत परिपक्व था. फिर ये बात भी थी कि यहां तीनों सेनाओं में तालमेल था. पाकिस्तान में ये बहुत बड़ी कमी थी (फोटो: Getty)

1962 में चीन के हाथों मिली शर्मनाक हार शास्त्री को विरासत में मिली थी. उस हार के जख्म बहुत ताजा थे अभी. सेना भी सतर्क थी. वो देश को किसी फसाद में नहीं फंसाना चाहती थी. इस लिहाज से देखिए, तो भारत और पाकिस्तान की सेना में स्याह-सफेद जितना अंतर था. इंडियन आर्मी का अप्रोच बहुत परिपक्व था. फिर ये बात भी थी कि यहां तीनों सेनाओं में तालमेल था. पाकिस्तान में ये बहुत बड़ी कमी थी, जिसका उसे बहुत नुकसान भी हुआ (फोटो: Getty)


भारत के आर्मी चीफ नहीं चाहते थे फसाद बढ़े
तब भारत के सेना प्रमुख थे जनरल जे एन चौधरी. उन्होंने प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को सलाह दी कि इस इलाके में लड़ाई न बढ़ाएं. जनरल चौधरी का कहना था कि इस इलाके की परिस्थितियां पाकिस्तान के मुनासिब हैं. यहां लड़ाई बढ़ी, तो भारत को नुकसान होगा. उन्होंने सुझाव दिया. कि अगर पाकिस्तान इस इलाके में अपनी आर्मी बढ़ाना जारी रखता है, तो भारत को कोई दूसरा फ्रंट खोलने के बारे में सोचना चाहिए. ऐसा फ्रंट, जहां लड़ना भारत के फायदे में हो. उधर पाकिस्तान किसी भी तरह ये फसाद बढ़ाकर इसे अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में ले जाना चाहता था.

ब्रिटेन दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने में लगा था. इस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे हेरोल्ड विल्सन. उन्होंने संघर्षविराम का प्रस्ताव दिया. शास्त्री और अयूब ने इसे मान लिया. विपक्षी दल और यहां तक कि कांग्रेस पार्टी के अंदर भी इस समझौते को लेकर काफी गुस्सा था. शास्त्री ने उन्हें समझाने की कोशिश की. कहा कि वो भारत के हितों को दांव पर लगाकर नहीं आए हैं. फिर भी शास्त्री के ऊपर समझौते से हटने का काफी दबाव था. ये मामला इतना गंभीर हो गया कि शास्त्री सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश हो गया. इस समझौते के बाद भारत में जहां ये सब हो रहा था, वहीं पाकिस्तान में अलग ही प्लानिंग चल रही थी. शास्त्री सरकार के आक्रामकता न दिखाने का मतलब पाकिस्तान ने ये लगाया कि भारत के पास दम नहीं है.


अयूब खान ने अपनी किताब 'फ्रेंड्स नॉट मास्टर्स' में लिखा है.
अयूब खान ने अपनी किताब ‘फ्रेंड्स नॉट मास्टर्स’ में लिखा है. कि सेना में प्लानिंग करते समय सबसे जरूरी होता है दुश्मन की काबिलियत जानना. ये समझना कि जिससे आपका मुकाबला है, वो क्या करने में समर्थ है. क्योंकि अगर कोई देश सामरिक तौर पर कुछ करने में सक्षम है, तो ये कभी नहीं माना जा सकता कि वो ये काम नहीं करेगा. इतनी अच्छी मिलिटरी समझ के बावजूद अयूब गच्चा खा गए (फोटो: Getty)

पाकिस्तान ने क्या सोचा?

मई 1965 में जब ये कच्छ के रण वाला विवाद चल रहा था, उसी दौरान भुट्टो ने अयूब को एक चिट्ठी भेजी. उसमें लिखा था-

‘मौजूदा वक्त में पाकिस्तान की सेना ज्यादा ताकतवर है. अपनी सैन्य ताकत की वजह पाकिस्तान भारत के मुकाबले बेहतर स्थिति में है. मगर हमारा ये अडवांटेज जल्द खत्म हो जाएगा. क्योंकि भारत आगे बढ़ने के लिए पूरा जोर लगा रहा है. 1965 की हो वो साल है, जब पाकिस्तान अपनी अडवांटेज का फायदा उठा सकता है. वरना तो बहुत देर हो जाएगी. अगर पाकिस्तान अपनी हस्ती का, अपने होने का मतलब पूरा करना चाहता है, तो उसे कश्मीर को आजाद कराना ही होगा. उसे समूचे कश्मीर को हासिल करना होगा.’

आगे बढ़ें, इससे पहले बता दें. कि PAKISTAN बस एक मुल्क का नाम भर नहीं है. ये एक किस्म का एक्रोनिम है. एक चौधरी रहमत अली थे. जनवरी 1933 में रहमत और कैम्ब्रिज के उनके तीन दोस्तों ने मिलकर ये पाकिस्तान का टर्म दिया था. इसमें हर शब्द एक खास जगह के लिए था. P माने पंजाब. A माने अफगानिया. ये अफगानिया शब्द नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस के लिए इस्तेमाल हुआ था. अब इसका नाम खैबर पख्तूनख्वा है. K माने कश्मीर. S माने सिंध और बलूचिस्तान. मतलब वो सारी जगहें, जिनको मिलाकर पाकिस्तान बनाने का सपना देखा गया था. बाकी सब तो पाकिस्तान को मिल गया. बस कश्मीर रह गया. भुट्टो ने अपनी चिट्ठी में जो लिखा, उसका मतलब यही था. कि हमारे पास सब कुछ है, लेकिन कश्मीर नहीं है.

अयूब ने न केवल शास्त्री को कमतर आंका, बल्कि वो भारत को भी कायर समझते रहे. उन्हें लगता था कि भारत हिंदू देश है और हिंदुओं के अंदर लड़ने का माद्दा नहीं होता. ऐसा ही उन्हें पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के लिए भी लगता था. अयूब ने बाद में महसूस किया होगा. कि उनका सारा ऑब्जर्वेशन ही गलत था (फोटो: Getty)
अयूब ने न केवल शास्त्री को कमतर आंका, बल्कि वो भारत को भी कायर समझते रहे. उन्हें लगता था कि भारत हिंदू देश है और हिंदुओं के अंदर लड़ने का माद्दा नहीं होता. ऐसा ही उन्हें पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के लिए भी लगता था. अयूब ने बाद में महसूस किया होगा. कि उनका सारा ऑब्जर्वेशन ही गलत था (फोटो: Getty)

न नेवी को कुछ बताया, न एयर फोर्स को
कच्छ के रण में भारत से हुई झड़प को पाकिस्तानी सेना ने भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया. पूरे पाकिस्तान में इसे एक बहुत बड़ी जीत के तौर पर प्रॉजेक्ट किया गया. लोगों से बताया गया कि देखो, हिंदुस्तानी कितने कायर होते हैं. कि वो लड़ नहीं सकते. अयूब को लगा, सब सही कह रहे हैं. यही मौका है कश्मीर हासिल करने का. इसी दिमाग के साथ अयूब खान ने एक टॉप लेवल की मीटिंग की. वो खुद थे, सेना प्रमुख मूसा खान थे. सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारी थे. मगर न वायु सेना प्रमुख को बुलाया गया और न ही नौसेना प्रमुख को. यहीं पर साजिश को फाइनल रंग दिया गया. इस प्लानिंग की खबर विदेश मंत्रालय तक को नहीं थी.

साजिश के दो पार्ट थे

पार्ट-I: ऑपरेशन जिब्राल्टर
ये साजिश दो चरणों में थी. पहली का नाम था ऑपरेशन जिब्राल्टर. जिब्राल्टर असल में स्पैनिश शब्द है. अरबी के ‘जबल तारिक’ का स्पैनिश उच्चारण. इस पहाड़ को अपना नाम मिला तारिक इब्न जियाद नाम के एक मशहूर अरब लड़ाके से. वो उत्तरी अफ्रीका लांघकर स्पेन गया था. जिन नावों की मदद से वो वहां तक पहुंचा, उन्हें उसने जला दिया. ताकि किसी भी सूरत में उसकी सेना पैर पीछे करने का खयाल मन में न लाए. पाकिस्तान को इस नाम में जीत का शगुन दिखा होगा. इस ऑपरेशन का मकसद था कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ कराना. ताकि ये लोग वहां जाकर लोगों के साथ मिल जाएं और उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काकर गदर शुरू करवा दें.

उस समय भारत के सेना प्रमुख थे जे एन चौधरी. फोटो में उनके साथ हैं एयर मार्शल अर्जन सिंह. ये नई दिल्ली स्थित डिफेंस मुख्यालय की फोटो है. ये सीजफायर के बाद की तस्वीर है. बाद के दिनों में मालूम चला कि पाकिस्तान के पास कोई तमीज की प्लानिंग नहीं थी. न ट्रेनिंग के स्तर पर, न अमल के स्तर पर, कहीं भी पाकिस्तान की तैयार ठीक नहीं थी (फोटो: Getty)
उस समय भारत के सेना प्रमुख थे जे एन चौधरी. फोटो में उनके साथ हैं एयर मार्शल अर्जन सिंह. ये नई दिल्ली स्थित डिफेंस मुख्यालय की फोटो है. बाद के दिनों में मालूम चला कि पाकिस्तान के पास कोई तमीज की प्लानिंग नहीं थी. न ट्रेनिंग के स्तर पर, न अमल के स्तर पर, कहीं भी पाकिस्तान की तैयार ठीक नहीं थी (फोटो: Getty)

पार्ट-II: ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम

ग्रैंड स्लैम मतलब एक साल के अंदर होने वाले किसी एक खास खेल के सारे बड़े मुकाबलों का सेट. जिसने ये सारे मुकाबले जीत लिए, उसने ग्रैंड स्लैम जीत लिया. पाकिस्तान के इस ग्रैंड स्लैम का मकसद था अखनूर पर कब्जा. ताकि भारत को कश्मीर के साथ जोड़ने वाली इकलौती सड़क पाकिस्तान के कब्जे में आ जाए. और इस तरह कश्मीर हमेशा-हमेशा के लिए भारत के हाथ से निकल जाए. ये पूरी साजिश दो कल्पनाओं पर टिकी थी. एक तो ये कि जैसे ही पाकिस्तानी मुजाहिदीन कश्मीर घाटी पहुंचेंगे, वहां के लोग उन्हें हाथोहाथ लेंगे. वो लोग एकजुट होकर भारत के खिलाफ बगावत कर देंगे. दूसरा ये कि भारत मुंहतोड़ जवाब देने की स्थिति में नहीं है. कुछ भी हो जाए, लेकिन भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं लांघेघा. वो पाकिस्तान में नहीं घुसेगा. भुट्टो ने तो अयूब को एक किस्म की गारंटी दी थी. कि इस साजिश का कामयाब होना बिल्कुल पक्की बात है.

हिंदुस्तान कुछ नहीं कर पाएगा: इस सोच ने हमेशा पाकिस्तान का बंटाधार किया है

बचपन में मैंने कई बार ऐसा किया है. अकेले लूडो खेला है. ये सोचकर कि पीली गोटी फलां की. और ये नीली मेरी. अकेले खेलते हुए मुझे आजादी रहती थी. अगर पीली के पास नीली गोटी को काटने का चांस है, तो वो चांस हटा देना. यहां न चलकर वहां चल देना. अकेले खेलकर मिली इस जीत से भी मुझे खुशी होती. काल्पनिक विरोधी को हराने की संतुष्टि अलग. 1965 की इस जंग में पाकिस्तान ने ऐसा ही किया. खुद से ही चाल सोच ली और खुद ही जीत का ख्वाब देख लिया. 1965 की जंग कोई अपवाद नहीं थी. पाकिस्तान ने हमेशा ही ऐसा किया है. फिर चाहे वो 1947-48 की लड़ाई हो. या 65 की जंग. या फिर 1999 का कारगिल युद्ध. जहां पाकिस्तान ने सोचा कि बानिहाल और जोजिला से हमला करेंगे. कश्मीर में पोस्टेड सारी हिंदुस्तानी फौज इन दोनों जगहों पर भागी आएगी. घाटी खाली हो जाएगी. फिर हम वहां पहुंचकर कश्मीर को जीत लेंगे. जो करेंगे, बस हम करेंगे. हिंदुस्तान कुछ नहीं करेगा. ऐसा सोचने की मूर्खता करना पाकिस्तान की आदत रही है. 1965 में पाकिस्तान क्या सोचकर जंग में कूदा था, ये हमने आपको बता दिया. मगर जमीन पर क्या हुआ, ये हम आपको बताएंगे अपनी अगली किस्त में.


Pakistan Political History: Operation Gibraltar and Grand Slam, how Islamabad planned the War of 1965

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