दरिद्रनारायण ---- आचार्य अर्जुन तिवारी

22 जुलाई 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (74 बार पढ़ा जा चुका है)

दरिद्रनारायण ---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म की उन्नति में सतसंग कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है | जहाँ एक ओर सतसंग करके हमारे पूर्वजों ने नित्य नये ज्ञान अर्जित करते रहे हैं वहीं सदैव से कुछ लोग सतसंग कथाओं में विघ्न भी डालते आये हैं | यह आवश्यक नहीं है कि वे ऐसा जानबूझकर करते हों परंतु कुछ ऐसा अवश्य कर जाते हैं जिससे सतसंग भंग हो जाता रहा है | इसके कारण पर विचार करने पर "गोलोकवासी परमपूज्य पिताजी" के मुखारविन्द से सुनी एक कथा याद आ रही है कि :- भगवान नारायण ने सभी देवताओं , दैत्यों एवं मनुष्यों को उनका कार्य बताकर कार्यक्षेत्र भी सौंप दिया | अपने अपने कार्यक्षेत्र सभी चले भी गये | तब भगवान नारायण की दृष्टि एक मरियल से मनुष्य पर पड़ी | पूंछने पर उसने बताया कि वह "दरिद्र" है , और हे प्रभु ! आपने मुझे कोई कार्य बताया ही नहीं | देर तक भगवान ने विचार करके उससे कहा कि तुम्हारा कार्य है कि तुम लोगों को मेरी भक्ति न करने दो और कार्यक्षेत्र है मेरी कथायें और सतसंग | क्योंकि जब सभी लोग सतसंग करके स्वर्गवासी ही हो जायेंगे तो यमराज जी क्या करेंगे ?? तब से सतसंग कथाओं में बैठने वाले जैसे ही शिथिल होते हैं उनके ऊपर दरिद्र नारायण का प्रभाव हो जाता है | किसी मे लिखा भी है | "रामकथा जहँ होत हैं तहाँ दरिद्दिर जायं ! कोई बइठ बतलात है कोई बैठ औंघाय !! तब से दरिद्रनारायण प्रत्येक सतसंगी पर प्रहार अवश्य करते हैं | इनसे बचने के लिए चैतन्यता की आवश्यकता है |* *आज चारों ओर दरिद्रनारायण का प्रभाव दिख रहा है | कोई धन से दरिद्र है , आत्मिक दरिद्र है , कोई मानसिक दरिद्र तो कोई बौद्धिक दरिद्र | इस दरिद्रनारायण से कोई भी बचता नहीं दीख रहा है | चाहे जितना बड़ा सतसंगी या प्रभु का भक्त हो जैसे ही उसका मन भगवत्कथाओं से संसार की ओर बढता है तुरंत इनका प्रभाव उसके मस्तिष्क पर हो जाता है और मनुष्य सतसंग से इतर अन्य चर्चायें करने लगता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज जगह जगह जिस प्रकार भव्य कथाओं का आयोजन हो रहा है और इन आयोजनों में अपार भीड़ भी इकट्ठा हो रही है उसके अनुसार तो मनुष्यों को सत्पथ का अनुगामी हो जाना चाहिए , परंतु इन सतसंगकथाओं में आने वाले कुल १०% लोग ही सतसंग का लाभ ले पाते हैं शेष ९०% लोग दरिद्रनारायण से प्रभावित होकर समय व्यतीत करने आते हैं | सतसंग में क्या हो रहा है उनको इससे मतलब नहीं होता है वे अपना सतसंग अलग ही प्रारम्भ कर देते हैं इसका प्रभाव यह होता है कि न तो वे स्वयं सतसंग लाभ ले पाते हैं और न ही औरों को यह लाभ लेने देते हैं | यह इनकी बोद्धिक दरिद्रता का परिचायक है | बहुत यतन के बाद मानव जीवन मिला है , मनुष्य नहीं विचार कर पाता है कि थोड़ा सा समय जो सतसंग करने के लिए मिला है उसका सदुपयोग कर लिया जाय | मनुष्य सतसंग करना तो चाहता है परंतु उसकी शिथिलता के कारण ही दरिद्रनारायण उसके मस्तिष्क को भटकाने में सफल हो जाते हैं |* *आज आवश्यकता है चैतन्य होने की , सनातन पर बाहरी आक्रमण के साथ साथ आंतरिक (विषयों) आक्रमण भी समय समय पर होते रहे हैं | कोई भी दरिद्र होना नहीं चाहता होगा , तो प्रयास यह करना चाहिए कि सतसंग के समय एकाग्र होकर दरिद्रनारायण पर विजय प्राप्त की जाय , अन्यथा मानव जीवन का लक्ष्य ही व्यर्थ हो जायेगा |*

दरिद्रनारायण ---- आचार्य अर्जुन तिवारी

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