तुलसीदास जयंती

22 जुलाई 2018   |  Pratibha Bissht   (160 बार पढ़ा जा चुका है)

सम्पूर्ण भारतवर्ष में गोस्वामी तुलसीदास के स्मरण में तुलसी जयंती मनाई जाती है| श्रावण मास की सप्तमी के दिन तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है| इस वर्ष यह 17 अगस्त 2018 के दिन गोस्वामी तुलसीदास जयंती मनाई जाएगी| गोस्वामी तुलसीदास ने रामभक्ति के द्वारा न केवल अपना ही जीवन कृतार्थ किया अपितु सभी को श्रीराम के आदर्शों से बांधने का प्रयास किया|वाल्मीकि जी की रचना 'रामायण' को आधार मानकर गोस्वामी तुलसीदास ने लोक भाषा में राम कथा की रचना की|

ऐसा माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संभवत: सम्वत् 1589 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी देवी था।


तुलसी दास जी का जन्म मूल नक्षत्र में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था| ऐसी मान्यता है की तुलसी दास जी अपनी माता के गर्भ में 12 महीने तक रहने के कारण काफी हुष्ट- पुष्ट थे | कहा जाता है कि जन्म के समय तुलसीदास रोये नहीं थे और उनके मुख में पूरे बत्तीस दांत थे। लोगों का मानना है कि तुलसीदास संपूर्ण रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के अवतार थे। ऐसा कहा जाता है की तुलसी दास जी ने जन्म लेने के बाद इन्होने राम शब्द का उच्चारण किया था जिससे इनका नाम रामबोला पड़ गया|

तुलसी दास जी ने बचपन में बहुत दुःख सहे थे |उन्हें माता पिता से बिछुड़कर अकेले रहने पड़ा | आरम्भ में तुलसी दास जी भीख मांग कर गुजारा किया था |

इनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था| ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास को अपनी सुंदर पत्नी रत्नावली से अत्यंत लगाव था। एक बार तुलसीदास ने अपनी पत्नी से मिलने के लिए उफनती नदी को भी पार कर लिया था। तब उनकी पत्नी ने उन्हें उपदेश देते हुए कहा - "लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ" अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति ता। नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत बीता।।

रत्नावली ने कहा जितना प्रेम मेरे इस हाड-मांस के बने शरीर से कर रहे हो| उतना स्नेह यदि प्रभु राम से करते तो तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती। जिससे गोस्वामी तुलसी दास जी का जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी दास जी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और उनकी की चेतना जागी और उसी समय से वह प्रभु राम की वंदना में जुट गए। तुलसी दास जी के गुरु बाबा नरहरिदास थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी।

तुलसी दास जी का अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी और अयोध्या में व्यतीत हुआ| तुलसी दास जी अनेक स्थानों पर भ्रमण करते रहे उन्होंने अनेक कृतियों की रचना हैं, तुलसी दास द्वारा रचित ग्रंथों में रामचरित मानस, कवितावली, जानकी मंगल, विनय पत्रिका, गीतावली, हनुमान चालीसा ,बरवै रामायण इत्यादि रचनाएं प्रमुख हैं|

कलियुग के प्रारम्भ होने के पश्चात् सनातन हिन्दू धर्म यदि किन्हीं महापुरुषों का सबसे अधिक ऋणी है तो वह हैं- आदि गुरु शंकराचार्य और गोस्वामी तुलसीदास। शंकराचार्य जी ने 2500 वर्ष पूर्व बौद्ध मत के कारण लुप्त होती वैदिक परम्पराओं को पुनर्स्थापित करके दिग्दिगंत में सनातन हिन्दू धर्म की विजय वैजयंती फहराई। विदेशी आक्रमणकारियों के कारण मंदिर तोड़े जा रहे थे, गुरुकुल नष्ट किये जा रहे थे, शास्त्र और शास्त्रग्य दोनों विनाश को प्राप्त हो रहे थे, ऐसे भयानक काल में तुलसी दास जी प्रचंड सूर्य की भाँति उदित हुए|

उन्होंने जन भाषा में 'श्री रामचरितमानस' की रचना करके उसमें समस्त आगम, निगम, पुराण, उपनिषद आदि ग्रंथों का सार भर दिया और वैदिक हिन्दू सिद्धांतों को सदा के लिए अमर बना दिया था।

अंग्रेज़ों ने हज़ारों भारतीयों को ग़ुलाम बना कर मॉरीशस और सूरीनाम आदि के निर्जन द्वीपों पर पटक दिया था। उन अनपढ़ ग्रामीणों के पास धर्म के नाम पर मात्र 'श्रीरामचरितमानस' की एक आध प्रति थी। केवल उसी के बल पर आज तक वहां हिन्दू धर्म पूरे तेज के साथ स्थापित है। अनेकों ग्रंथों के रचियेता भगवान् श्री राम के परम भक्त गोस्वामी तुलसी दास जी भले ही तलवार लेकर लड़ने वाले योद्धा ना हों लेकिन उन्होंने अपनी भक्ति और लेखनी के बल पर इस्लामी आतंक को परास्त करके हिन्दू धर्म की ध्वजा फहराए रखने में अपूर्व योगदान दिया था।

ऐसी मान्यता है की तुलसी दास जी को भगवान हनुमान, राम- लक्ष्मण, और शिव- पार्वती जी के साक्षात दर्शन हुए थे |

तुलसी दास जी की मुख्य रचनाएँ :

तुलसी दास जी संस्क्रत भाषा के विद्वान थे अपने जीवनकाल में उन्होंने ने अनेक ग्रंथों की रचना की तुलसी दास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस को बहुत भक्तिभाव से पढ़ा जाता है,

रामचरितमानस जिसमें तुलसीदास जी ने भगवान राम के चरित्र का अत्यंत मनोहर एवं भक्तिपूर्ण चित्रण किया है. दोहावली में तुलसीदास जी ने दोहा और सोरठा का उपयोग करते हुए अत्यंत भावप्रधान एवं नैतिक बातों को बताया है| कवितावली इसमें श्री राम के इतिहास का वर्णन कवित्त, चौपाई, सवैया आदि छंदों में किया गया है.

रामचरितमानस के जैसे ही कवितावली में सात काण्ड मौजूद हैं. गीतावली सात काण्डों वाली एक और रचना है जिसमें में श्री रामचन्द्र जी की कृपालुता का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया है. इसके अतिरिक्त विनय पत्रिका कृष्ण गीतावली तथा बरवै रामायण, रामलला नहछू, जानकी मंगल, रामज्ञा प्रश्न और संकट मोचन जैसी कृत्तियों को रचा जो तुलसीदास जी की छोटी रचनाएँ रहीं. रामचरितमानस के बाद हनुमान चालीसा तुलसीदास जी की अत्यन्त लोकप्रिय साहित्य रचना है. जिसे सभी भक्त बहुत भक्ति भाव के साथ सुनते हैं.

तुलसी दास जी समाज के पथप्रदर्शक:

तुलसी दास जी ने उस समय में समाज में फैली अनेक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया अपनी रचनाओं द्वारा उन्होंने विधर्मी बातों, पंथवाद और सामाज में उत्पन्न बुराईयों की आलोचना की उन्होंने साकार उपासना, गो-ब्राह्मण रक्षा सगुणवाद एवं प्राचीन संस्कृति के सम्मान को उपर उठाने का प्रयास किया वह रामराज्य की परिकल्पना करते थे. इधर उनके इस कार्यों के द्वारा समाज के कुछ लोग उनसे ईर्ष्या करने लगे तथा उनकी रचनाओं को नष्ट करने के प्रयास भी किए किंतु कोई भी उनकी कृत्तियों को हानि नहीं पहुंचा सका|

आज भी भारत के कोने-कोने में रामलीलाओं का मंचन होता है. उनकी इनकी जयंती के उपलक्ष्य में देश के कोने कोने में रामचरित मानस तथा उनके निर्मित ग्रंथों का पाठ किया जाता है. तुलसी दास जी ने अपना अंतिम समय काशी में व्यतित किया और वहीं विख्यात घाट असीघाट पर संवत‌ 1680 में श्रावण कृष्ण तृतीया के दिन अपने प्रभु श्री राम जी के नाम का स्मरण करते हुए अपने शरीर का त्याग किया |

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