प्रेम और ध्यान

23 जुलाई 2018   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (71 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रेम और ध्यान

प्रेम और ध्यान

मैंने देखा, और मैं देखती रही / मैंने सुना, और मैं सुनती रही

मैंने सोचा, और मैं सोचती रही / द्वार खोलूँ या ना खोलूँ |

प्रेम खटखटाता रहा मेरा द्वार / और भ्रमित मैं बनी रही जड़

खोई रही अपने ऊहापोह में |

तभी कहा किसी ने / सम्भवतः मेरी अन्तरात्मा ने

तुम द्वार खोलो या ना खोलो / द्वार टूटेगा,

और प्रेम आएगा भीतर

कब, इसका भान भी नहीं हो पाएगा तुम्हें |

हाँ, यदि करती रही प्रयास इसे पाने का

गणनाएँ और मोल भाव

तो लौटना होगा रिक्त हस्त

क्योंकि रह जाएगा वह बाहर ही द्वार के |

क्या होगा, इसका प्रश्न क्यों ?

कब होगा, इसका विचार क्यों ?

कैसे होगा, इसका चिन्तन क्यों ?

कितना होगा, इसका मनन क्यों ?

छोड़ दो ये सारे प्रश्न, विचार, चिन्तन और मनन

प्रेम के प्रकाश को करने दो पार

सीमाएँ अपने समस्त तर्कों की

और तब, प्रेम बन जाएगा ध्यान |

ध्यान, जो तुम स्वयं हो

ध्यान, जो होगा तुममें

ध्यान, जो होगा तुम्हारे लिये

ध्यान, जो होगी तुम स्वयम् ||

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