आईने तो यों ही बदनाम होते हैं,

25 जुलाई 2018   |  मदन पाण्डेय 'शिखर'   (56 बार पढ़ा जा चुका है)


आईने तो यों ही बदनाम होते हैं,

कुछ चेहरे भी, गुमनाम होते हैं

बंद पलकों में रखते जिन्हें लोग-

चर्चे अक्सर वही आम होते हैं ।


रिश्ते बहुत नाज़ुक हुआ करते हैं ,

चंद सांसों में भी टूट जाते हैं,

हम बहुत याद करते हैं जिनको-

वही तो अक्सर रूठ जाते हैं ।


यह तो कमबख्त हँसी हैं जो,

दूसरों के लिए हँसा करती है,

वर्ना एक नकली हंसी में तो-

ज़िन्दगी सौ बार मरती है,


दर्द आँखों का, हमसाया होता है,

‘जालिम’ जैसे बहुत पराया होता है,

हौले-हौले से दिल तक उतर आता है,

जैसे कोई ‘दोस्त’, ठुकराया होता है ।




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