“मुक्तक” बदला हुआ मौसम बहक बरसात हो जाए।

26 जुलाई 2018   |  महातम मिश्रा   (93 बार पढ़ा जा चुका है)

 “मुक्तक” बदला हुआ मौसम बहक बरसात हो जाए।

“मुक्तक”


बदला हुआ मौसम बहक बरसात हो जाए।

उड़ता हुआ बादल ठहर कुछ बात हो जाए।

क्यों जा रहे चंदा गगन पर किस लिए बोलो-

कर दो खबर सबको पहर दिन रात हो जाए॥-१

अच्छी नहीं दूरी डगर यदि प्रात हो जाए।

नैना लगाए बिन गर मुलाक़ात हो जाए।

ले हवा चिलमन उडी कुछ तो शरम करो-

सूखी जमी बौंछार की सौगात हो जाए॥-२


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: “चतुष्पदी”सुना था कल की नीरज नहीं रहे।



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
18 जुलाई 2018
“हाइकु”कुछ तो बोलो अपनी मन बातकैसी है रात॥सुबह देखो अब आँखें भी खोलो चींखती रात॥ जागते रहोकरवट बदलो ये काली रात॥ टपके बूंद छत छाया वजूद भीगती रात॥ दिल बेचैन फिर आएगी रैन जागती रात.. महातम मिश्र , गौतम गोरखपुरी
18 जुलाई 2018
02 अगस्त 2018
“कुंडलिया”इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल। क्या खरीद सकता कभी पैसा इनकी धूल॥ पैसा इनकी धूल फूल खिल रिमझिम पानी। हँसता हुआ गरीब हुआ है कितना दानी॥ कह गौतम कविराय प्याज औ लहसुन भिनका। ऐ परवर सम्मान करो मुँह तड़का इनका॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी
02 अगस्त 2018
30 जुलाई 2018
"छंद रोला मुक्तक”पहली-पहली रात निकट बैठे जब साजन।घूँघट था अंजान नैन का कोरा आँजन।वाणी बहकी जाय होठ बेचैन हो गए-मिली पास को आस पलंग बिराजे राजन।।-१खूब हुई बरसात छमा छम बूँदा बाँदीछलक गए तालाब लहर बिछा गई चाँदी। सावन झूला मोर झुलाने आए सैंया-
30 जुलाई 2018
19 जुलाई 2018
"गीत"चैन की बांसुरी बजा रहे बाबासु-धर्म की धूनी जगा रहे बाबाआसन जमीनी जगह शांतिदायी नदी पट किनारे नहा रहे बाबा॥..... चैन की बांसुरी बजा रहे बाबामाया सह काया तपा रहे बाबा सुमन साधना में चढ़ा रहे बाबा सुंदर तट लाली पीत वसन धारीराग मधुर संध्या
19 जुलाई 2018
23 जुलाई 2018
छंद- दुर्मिल सवैया (वर्णिक ) शिल्प - आठ सगण सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२"दुर्मिल सवैया"हिलती डुलती चलती नवका ठहरे विच में डरि जा जियरा।भरि के असवार खुले रसरी पतवार रखे जल का भँवरा ।।अरमान लिए सिमटी गठरी जब शोर मचा हंवुका उभरा।ततक
23 जुलाई 2018
11 जुलाई 2018
“पिरामिड”वो वहाँ तत्पर बे-खबर प्रतीक्षारत मन से आहतप्यार की चाहत आप यहीं बैठे हैं॥-१ है वहाँ उद्यत आतुरता सहृदयितानैन चंचलता विकल व्याकुलता-२ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
11 जुलाई 2018
13 जुलाई 2018
मापनी- २१२ २१२ १२२२ “मुक्तक” हर पन्ने लिख गए वसीयत जो। पढ़ उसे फिर बता हकीकत जो। देख स्याही कलम भरी है क्या- क्या लिखे रख गए जरूरत जो॥-१ गाँव अपना दुराव अपनों से। छाँव खोकर लगाव सपनों से। किस कदर छा रही बिरानी अब- तंग गलियाँ रसाव नपनों से
13 जुलाई 2018
20 जुलाई 2018
“मुक्तक” शांति का प्रतीक लिए उड़ता रहता हूँ। कबूतर हूँ न इसी लिए कुढ़ता रहता हूँ। कितने आए-गए सर के ऊपर से मेरे- गुटरगूं कर-करके दाना चुँगता रहता हूँ॥-१ संदेश वाहक थे पूर्वज मेरे सुनता रहता हूँ। इस मुंडेर से उस मुंडेर भटकता रहता हूँ। कभी खत लटक जाते गले कभी मैं तार से- रास
20 जुलाई 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x