नदी

29 अप्रैल 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (277 बार पढ़ा जा चुका है)

नदी

सुधी साथियो,
'बाघ' देखा है कभी आपने...? ज़रूर देखा होगा; और बहुत मुमकिन है कि कभी 'बाघ' शीर्षक की कविता का भी रस लिया हो ! अगर 'हाँ' तो अवश्य आपने डाo केदारनाथ सिंह की रचना पढ़ी होगी । 'बाघ' आपकी वो कविता है जो मील का पत्थर मानी जाती है । बहमुखी प्रतिभा के साहित्यकार डाo केदारनाथ सिंह सन 1934 में बलिया उत्तर प्रदेश के चकिया ग्राम में जन्मे थे । 'अकाल में सारस' कविता संग्रह के लिए आपको सन १९८९ में साहित्य अकादमी तथा अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । डाo केदारनाथ सिंह समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं । आपके प्रमुख कविता संग्रह हैं-अभी बिलकुल अभी, ज़मीन पाक रही है, यहाँ पर देखो, अकाल में सारस, टॉलस्टॉय और साईकिल, तीसरा सप्तक आदि । आपके प्रमुख निबंध और कहानियां हैं- मेरे समय के शब्द, कल्पना और छायावाद, हिंदी कविता में बिम्ब विधान, कब्रिस्तान में पंचायत आदि । 'शब्दनगरी' के मंच से आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं डाo केदारनाथ सिंह​ की अनुपम कविता 'नदी'...


अगर धीरे चलो
वह तुम्हें छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक कि कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अँधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में
सच्चाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
नदी जो इस समय नहीं हैं इस घर में
पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं
किसी चटाई
या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई
कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए,
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आस-पास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी I


-केदारनाथ सिंह

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