हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

01 मई 2015   |  वैभव दुबे   (474 बार पढ़ा जा चुका है)

हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

हिकारत भरी नज़रें मिली बस और मिला है क्या।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?


माँ के आँचल,पिता के कांधे से भी दूर हो गये।
हम दर-दर भटकने को भी मजबूर हो गये।
ऊँगली पकड़ कर चलने का मौका भी न मिल सका।
फिर गिर कर सम्हल न पाए इसमें हमारा दोष क्या?
अभी ज्ञान ही नहीं हमें,तो दें इम्तिहान क्या?
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?


उम्मीदों के दिए आँखों में सुबह से जलाते हैं।
और शाम होते-होते वो दिए बुझ भी जाते हैं।
फिर वही अँधेरा और वही ख़ामोशी होती है।
घुटनों में दबे पेट में भूख दम तोड़ देती है।
बेबसी की आग को पानी से बुझा दिया।
और फिर सुबह की आस में खुद को सुला लिया।


गर यही जिंदगी है तो ऐ मालिक,जन्म क्यों दिया।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?


माना की कपड़े गंदे मगर हर एहसास रखते है।
नहला कर देखो प्यार की बारिश में हम दिल साफ़ रखते हैं।
मंदिर में नारियल मजार पर चादर चढाते हो।
गुरूद्वारे में धन और गिरजाघर में मोम जलाते हो।
धर्म के नाम पर होते यहाँ हर रोज चंदे हैं।
कभी हम पर भी नजर डालो हम उसी के बन्दे हैं।


शायद आएगी खुशियों की कभी कोई रात क्या।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?


आकर थाम लो हमारे ये लड़खड़ाते हुए कदम।
अभी तो कच्ची माटी हैं जैसा बनाओ बन जायेगें हम।
राम,रहीम,गुरु,विलियम कोई भी नाम दे दो।
रक्त का रंग तो एक ही है उसी में ढल जायेंगे हम।
ममता की गोद में अब हमें झुला झुलाओ न।
तरस रहेहैं हम कोई बेटा कह कर बुलाओ न।


वक़्त की आँधियों में बुझ न जाए ये दिया।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

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वैभव दुबे
20 सितम्बर 2015

धन्यवाद शब्दनगरी मेरी कविता को अन्य साइट्स पर उपलब्ध कराने के लिए
परन्तु जब मैंने फेसबुक पर इस कविता के लिंक को देखना चाह तो एरर दिखा रहा है
समधान करें।
धन्यवाद

प्रिय वैभव जी , सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई ..

प्रिय मित्र , आपकी इस उत्क्रष्ट रचना को शब्दनगरी के फ़ेसबुक , ट्विट्टर एवं गूगल प्लस पेज पर भी प्रकाशित किया गया है । नीचे दिये लिंक्स मे आप अपने पोस्ट देख सकते है - https://plus.google.com/+ShabdanagariIn/posts https://www.facebook.com/shabdanagari https://twitter.com/shabdanagari - प्रियंका शब्दनगरी संगठन

वैभव जी , आपकी सभी रचनाएँ पढ़ी | सभी एक से बढ़कर एक है , समाज के अनछुए पहलु को भी आपकी लेखनी ने छुआ है | ऐसे ही कलम को धारदार बनाये रखिये | बहुत -बहुत शुक्रिया संगठन और हमसे जुड़ने के लिए |

उत्साहवध॓न के लिय़े आप सभी क़ेा हादि॔क धन्य़वाद।

वक़्त की आँधियों में बुझ न जाए ये दिया।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या....सुंदर कविता....आभार !

बिल्कुल सत्यता का बखान किया है आपने दूबे जी किंतु यह भी सच्चाई है कि समा्ज सुधार के लिए योगदान मिलना कठिन है और धार्मिक काम के लिुए बहुत ही आसान- बहुत अच्छी रचना

माना की कपड़े गंदे मगर हर एहसास रखते है।
नहला कर देखो प्यार की बारिश में हम दिल साफ़ रखते हैं।
मंदिर में नारियल मजार पर चादर चढाते हो।
गुरूद्वारे में धन और गिरजाघर में मोम जलाते हो।
धर्म के नाम पर होते यहाँ हर रोज चंदे हैं।
कभी हम पर भी नजर डालो हम उसी के बन्दे हैं।...............बहुत सही बात ... सुन्दर रचना के लिए अनेकानेक बधाइयाँ वैभव दुबे जी

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