"छंद रोला मुक्तक”पहली-पहली रात निकट बैठे जब साजन।

30 जुलाई 2018   |  महातम मिश्रा   (112 बार पढ़ा जा चुका है)

"छंद रोला मुक्तक”


पहली-पहली रात निकट बैठे जब साजन।

घूँघट था अंजान नैन का कोरा आँजन।

वाणी बहकी जाय होठ बेचैन हो गए-

मिली पास को आस पलंग बिराजे राजन।।-१


खूब हुई बरसात छमा छम बूँदा बाँदी

छलक गए तालाब लहर बिछा गई चाँदी।

सावन झूला मोर झुलाने आए सैंया-

ननदी करें किलोल सिखाएं सासू दादी।।-२


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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