आइसक्रीम

11 मई 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (239 बार पढ़ा जा चुका है)

आइसक्रीम

नज़्म...
अटकी हुई है
देर से,
ज़ेहन के
गोशों में कहीं।
मुंह लटकाए
पड़ी है कब से,
खामोखयाली की
मटमैली चादर ओढ़े।
करेले सा ...
कडुआपन
हलक को
चीरे जाता है जैसे;
एक बच्चे ने
आइसक्रीम
खाते-खाते
बहा रखी है
कुहनियों तक,
थोड़ी सी
मैं भी चख लूँ
फिर लिखता हूँ।
नज़्म अटकी हुई है
देर से......!


अगला लेख: सम्मान अमर वाणी-2015



एक बच्चे ने
आइसक्रीम
खाते-खाते
बहा रखी है
कुहनियों तक, बहुत सुन्दर एहसास !

जेहन के गोशों से वाक्य में एक अच्छी नजम निकली है

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