“कुंडलिया”इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल।

02 अगस्त 2018   |  महातम मिश्रा   (57 बार पढ़ा जा चुका है)

 “कुंडलिया”इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल।

“कुंडलिया”


इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल।

क्या खरीद सकता कभी पैसा इनकी धूल॥

पैसा इनकी धूल फूल खिल रिमझिम पानी।

हँसता हुआ गरीब हुआ है कितना दानी॥

कह गौतम कविराय प्याज औ लहसुन भिनका।

ऐ परवर सम्मान करो मुँह तड़का इनका॥


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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