एक कश्ती सौ तूफां, जाएं तो जाएं कहां

03 अगस्त 2018   |  Shashi Gupta   (222 बार पढ़ा जा चुका है)

एक कश्ती सौ तूफां, जाएं तो जाएं कहां

"समझेगा, कौन यहाँ दर्द भरे, दिल की ज़ुबां रुह में ग़म, दिल में धुआँ जाएँ तो जाएँ कहाँ... एक कश्ती, सौ तूफां " अपनों से जब वियोग हो जाता है, शरीर जब साथ छोड़ने लगता है, प्रेम जब धोखा देता है, कर्म जुगाड़ तंत्र में उपहास बन जाता है, लक्ष्मी जब रूठ जाती है, पथिक जब राह भटक जाता है, जब आत्मविश्वास डगमगाने लगता है, ऐसे में दिल का दर्द समझने वाला भी जब कोई नहीं होता है, तो स्मृतियों का सानिध्य संजीवनी बन जाता है। अजनबियों संग स्नेह का बंधन प्रकाश बन जाता है। मेरे जीवन में ऐसा बहुत कुछ घटित होता रहा है, अतः निःसंकोच कह रहा हूं। हां, यह भी कि संघर्ष मार्ग दिखलाता है, संघर्ष पहचान दिलाता है और यह संघर्ष ही है कि साधारण से इंसान को महात्मा गांधी बनाता है, बापू बनाता है , अहिंसा का पुजारी बनाता है। हमें भी इसी राह में बढना है। परंतु पहले एक आम आदमी जैसा बनना है। यहां कोई मिलावट नहीं है, कोई दिखावा नहीं है, कोई छल भी तो नहीं है। कर्मपथ पर बढ़ने की राह में यह पहली सीढ़ी है हमारी। तभी हम जुगाड़ तंत्र से लड़ेंगे, गिरेंगे और फिर सम्हलकर खड़े होंगे। सच की राह पर अंतिम सांस तक अपने पूरे सामर्थ्य का प्रदर्शन करना है हमें,रणभूमि के उस योद्धा की तरह जिसे पता है कि वीरगति ही उसकी नियति है, क्यों कि शत्रु सेना भारी है। मैं यह सब यूं ही नहीं कह रहा हूं आपसे मित्रों, मुझे भी अपनी कुटिलता के चक्रव्यूह में इसी जुगाड़ तंत्र के खिलाड़ियों ने यहां फंसाया है। मेरी लेखनी को कमजोर करने के लिये, मेरे मनोबल को तोड़ने के लिये और मुझे मेरी संस्थान की नजरों में गिराने के लिये। मैं टूटा जरुर परंतु फिर उठ खड़ा हुआ हूं , एक ब्लॉग लेखक के रुप में। फिर भी मेरा एक सवाल उस सामर्थ्यवान कृष्ण से है कि यदि कर्मवीर अभिमन्यु जुगाड़ तंत्र के षड़यंत्र रुपी चक्रव्यूह में फंस कर मारा गया, तो हे केशव ! फिर तुम्हारा पुरुषार्थ कैसा? क्या तुम यही चाहते थे कि वीर अभिमन्यु को बलिवेदी पर चढ़ा , उसके संग हुये अन्याय की बात बार-बार उठा उसी तरह छल से , वही हश्र शत्रुपक्ष के महारथियों का भी करोगे । पर एक सरल इंसान के लिये तुम्हारी इस कला का अनुसरण करना सम्भव है क्या । कितने प्रयास के बाद तो तुमने धर्मराज युधिष्ठिर को अर्धसत्य बोलने के लिये मनाया था। परंतु हर कोई तो तुम्हारी तरह जीवन रुपी इस शतरंज का उतना कुशल खिलाड़ी नहीं है। हमारे पास अपना चिन्तन है, यदि कर्म वीर हैं तो भी हम बस अपनी नियति से लड़ते हैं, झगड़ते हैं, मचलते हैं। लेकिन अर्जुन की विजय तभी सम्भव है, जब सारथी कृष्ण संग हो। अन्यथा तो महाभारत रुपी जुगाड़ तंत्र में वह भी अभिमन्यु सा ही वीरगति को प्राप्त होता। बिन कृष्ण महाभारत युद्ध का पूरा परिदृश्य बदल जाता। सत्य पराजित होता , जुगाड़ तंत्र विजयी होता। इसी यक्ष प्रश्न को लिये मैं व्याकुल पथिक बना भटक रहा हूं कि कर्मपथ पर चलने वाले हम जैसों को वह कृष्ण कहां मिलेगा , किस रुप में मिलेगा , कैसे पहचान हो उसकी। लोकतंत्र तंत्र के चार स्तंभ हैं। इनमें उस नरसिंह का दर्शन भक्त प्रह्लाद को अब नहीं हो पा रहा है, जो उसके आत्मविश्वास की रक्षा के लिये प्रकट हो जुगाड़ तंत्र बने हिरण्यकश्यप का वध कर सके। सच कहूं, तो हमारे इस चिन्तन और चिन्ता दोनों को ही हर कोई नहीं समझ सकता, वह तो बस मुझे एक व्याकुल पथिक ही समझेगा। फिर भी उस कृष्ण की खोज मेरा जारी रहेगा। जो इस जुगाड़ तंत्र रुपी महाभारत में कर्मपथ पर चलने वाले अर्जुन का सारथी बन सके, उसका सखा बन सके , उसका पथ प्रदर्शक बन सके और उसके रथ का रक्षक भी बन सके। आप सभी प्रबुद्धजनों को जो भी सत्य के मार्ग पर है उन्हें , मेरे इस यक्ष प्रश्न के उत्तर तलाशने ही होंगे। मेरी पराजय में आपकी भी हार निहित है। मेरा का तात्पर्य आप समझ रहे हैं न बंधुओं ? यह इसी जुगाड़ तंत्र के विरुद्ध एक संघर्ष का प्रतीक है। हम इस राह पर चल कर लूट जरुर गये हैं, फिर भी अपने पदचिह्न छोड़े जा रहे हैं। कहां दलदल है और कहां से चलना है, यह भी बता कर जा रहे हैं। मैं कितने उत्साह से पत्रकारिता के इस क्षेत्र में आया था, लेकिन हर ओर घड़ियाल मिल गये। फिर भी ईमानदारी इसलिये बची रही कि अपना घर-परिवार नहीं है। शाम को जब कमरे पर लौटता हूं , तो वह जीवन संगिनी नहीं है, जिसकी मधुर मुस्कान के बदले क्या मैं उसे कोई उपहार तक न देता ? ऐसा पाषाण हृदय भला कहां से लाता तब कि खाली हाथ घर को लौट आता। बच्चे होते तो अब तक तो बड़े भी हो गये होते। यदि बिटिया होती तो उसका हाथ पीला करने की चिन्ता बनी रहती। फिर भला इन जरूरतों के आगे मेरा स्वाभिमान कहां तक टिक पाता, आदर्श की बातें और है, परंतु इस बरसात के सुहावने मौसम में दिल के उफान को थामना यूं आसान भी नहीं है- "रिम-झिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन रिम-झिम गिरे सावन ... पहले भी यूँ तो बरसे थे बादल, पहले भी यूँ तो भीगा था आंचल अब के बरस क्यूँ सजन, सुलग सुलग जाए मन भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन रिम-झिम गिरे सावन ..."

अगला लेख: दो दिन से लेख पोस्ट न होने के संदर्भ में प्रश्न?



रेणु
06 अगस्त 2018

प्रिय शशि भाई -- आज तो धीरज का प्याला अनायास कुछ ज्यादा ही छलक गया | अपने परिवार के ना होने की पीड़ा और अजन्मे रिश्तों की कसक शब्द -शब्द से अतंस की वेदना बन बहती रही | बहुत बड़ा मोल चुकाया आपने ईमानदार होने का या फिर ईमानदारी ने आपको इस और सोचने का मौक़ा ना दिया | सचमुच आज सभी अपनों की ख़ुशी के लिए भ्रष्ट तन्त्र को मजबूत करने में कोई कसर नही छोड़ रहे सबके लिए अपनों की ख़ुशी सर्वोपरी होती जा रही है | सर्व समर्थ और ज्यादा पाने की चाह में भ्रष्टाचार के पंक में आकंठ गोते लगा रहे हैं | पर कोई तो है जो इस भ्रष्ट तन्त्र का हिस्सा ना होकर उसे आइना दिखाता है | गीतों के माध्यम से मन की पीड़ा को दर्शाना बहुत ही मर्मस्पर्शी है | ये पारदर्शी लेखन भी कोई आसन काम नहीं फिर भी आप कर पा रहे हैं शायद इसलिए कि आप खोने पाने के भय से कहीं ऊपर जा चुके हैं | लिखते रहिये मेरे भाई -- शायद यही लेखन पीड़ा के लिए कुछ देर के लिए मरहम बन जाए | सस्नेह --

Shashi Gupta
06 अगस्त 2018

जी रेणु दी आप सभी के स्नेह से कुछ आगे बढ़ रहा हूं और अपने विचारों को व्यक्त करना भी सीख रहा हूं

आलोक सिन्हा
05 अगस्त 2018

बहुत ही अच्छा लेख है |

Shashi Gupta
06 अगस्त 2018

प्रणाम

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