मित्र एवं मित्रता दिवस ----- आचार्य अर्जुन तिवारी

06 अगस्त 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (38 बार पढ़ा जा चुका है)

मित्र एवं मित्रता दिवस ----- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*संसार में मनुष्य के लिए जितना महत्त्व परिवार व सगे - सम्बन्धियों का है उससे कहीं अधिक महत्त्व एक मित्र है | बिना मित्र बनाये न तो कोई रह पाया है और न ही रह पाना सम्भव है | मित्रता का जीवन में एक अलग ही स्थान है | मित्र बना लेना तो बहुत ही आसान है परंतु मित्रता को स्थिर रखना और जीवित रखना, सदा-सदा के लिए बनाये रखना भी एक साधना है | यह हृदय के निर्बाध आदान-प्रदान पर स्थिर रहती है | मैत्रीपूर्ण संबंध एक परिवार के सदस्यों में भी नहीं हो सकते हैं और हो अनजान व्यक्तियों में दो सकते हैं | परंतु मित्र बनाते समय इतना अवश्य ध्यान रखें कि जिसे मित्र बनाया जा रहा है उसका चरित्र कैसा है | क्योंकि पंचतंत्र में कहा गया है :-"आरम्भगर्थी क्षयिणी क्रमेण लब्धी पुरा वृद्धिमती च पञ्चान् ! दि स्य पूर्वार्ध परार्ध भिन्ना छायेव मैत्री अल प्रज्जनात् !!" अर्थात :- “दुष्ट की मित्रता सूर्य उदय के पीछे की छाया के सदृश्य पहले तो लंबी चौड़ी होती है फिर क्रम से घटती जाती है और सज्जनों की मित्रता तीसरे पहर की छाया के सदृश्य पहले छोटी और फिर क्रमशः बढ़ती जाती है |" विपरीत चरित्र से मित्रता करने पर आपका भविष्य भी अंधकारमय हो सकता है | वैसे तो संसार में मित्रता की अनेक कथाये पढने या सुनने को मिल जाती हैं परंतु इतिहास की दो प्रमुख कथायें मित्रता का अलौकिक उदाहरण हैं | भगवान श्री कृष्ण एवं दरिद्र ब्राह्मण सुदामा की मित्रता तो जगतविदित है ही वहीं द्वापरयुग में ही दुर्योधन एवं कर्ण की मित्रता को अनदेखा नहीं किया जा सकता | दुर्योधन की गल्ती जानते हुए भी , कुन्ती द्वारा कर्ण को अपना ही पुत्र होने का रहस्य बताने के बाद भी , कर्ण ने दुर्योधन की मित्रता का त्याग न करते हुए भारत के महाभारत में दुर्योधन की ही ओर से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ | ऐसा उदाहरण शायद ही कोई दूसरा देखने को मिले |* *आज के मित्र एवं मित्रता का सत्य क्या है यह बताने की आवश्यकता ही नहीं रह गयी है | आज लोग सच्ची मित्रता की अपेक्षा स्वार्थवश ही मित्र बनते एवं बनाते रहते हैं | आज का मनुष्य स्वयं को इतना चालाक समझने लगा है कि अपना कोई भी कार्य सम्पन्न कराने के लिए मित्र बना लेता है और जैसे ही उसका वह कार्य सम्पन्न हो जाता है वह अपने तथाकथित मित्र को पहचानना भी बंद कर देता है | मित्रता करते समय सर्वप्रथम जिसे आप मित्र बनाना चाहते हैं उसे अपनी कसौटी पर कसकर देख लें कि यह खरा है कि नहीं क्योंकि मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज में देख रहा हूँ कि न तो मित्र बनाते देर लगती है और न ही मित्रता टूटने में | मित्रता जब टूटती है तो यह शत्रुता में ही परिवर्तित होती है | प्रत्येक मनुष्य को उन कारणों पर ध्यान देना आवश्यक है जिसके कारण मित्रता में दरार आ जाती है | आचार्य चाणक्य ने लिखा है :-- "इच्छेच्चेद विपुलाँ मैत्री त्रीणि तत्रन कारयेत् ! वाग्वादमर्थ संबंध तत्पत्नी परिभाषणम् !!" अर्थात :- “मित्र से बहस करना, उधार लेना-देना, उसकी स्त्री से बात-चीत करना छोड़ देना चाहिए | ये तीनों बातें मित्रता में बिगाड़ पैदा कर देती हैं | ” मित्र के काम के समय और व्यस्तता को ध्यान में न रखकर उसका समय बरबाद करना, घर आने पर उसको कोई महत्व न देना, बिना मतलब किसी भरोसे में रखना, व्यवहार में उपेक्षा रखना आदि ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं जो मित्रता के लिए घातक सिद्ध हो सकती हैं | यदि इन बातों का ध्यान रखा जाय तो मित्रता चिरस्थायी हो सकती है |* *आज सम्पूर्ण विश्व में "मित्रता - दिवस" मनाया जा रहा है | परंतु क्या मित्रता को एक दिन ही मना लेना उचित है ?? कदापि नहीं ! मित्रता प्रतिदिन मनानी चाहिए न कि एक दिन |*

अगला लेख: दरिद्रनारायण ---- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
24 जुलाई 2018
*सनातन धर्म में तपस्या का महत्वपूर्ण स्थान रहा है | हमारे ऋषियों - महर्षियों एवं महापुरुषों ने लम्बी एवं कठिन तपस्यायें करके अनेक दुर्लभ सिद्धियां प्राप्त की हैं | तपस्या का नाम सुनकर हिमालय की कन्दराओं का चित्र आँखों के आगे घूम जाती है | क्योंकि ऐसा सुनने में आता है कि ये तपस्यायें घर का त्याग करके
24 जुलाई 2018
26 जुलाई 2018
*मानव जीवन इतना विचित्र है कि इसमें मनुष्य को अनेक अनुभव होते रहते हैं | मनुष्य की मन:स्थिति ऐसी होती है कि वह क्षण भर दु:खी और दूसरे क्षण सुखी हो जाता है | विचित्र बात यह है कि मनुष्य दु:खी हो जाता है तो सारा दोष दूसरों को या फिर परमात्मा को दे देता है और सुखी होने पर सारा श्रेय स्वयं ले लेता है |
26 जुलाई 2018
26 जुलाई 2018
*धरती पर पुण्यभूमि भारत में जन्म लेने के बाद मनुष्य ने उत्तरोत्तर - निरन्तर विकास करते हुए एक आदर्श प्रस्तुत किया है | आदिकाल से हमारी संस्कृति हमारे संस्कार ही हमारी पहचान रहे हैं | बालक के जन्म लेके के पहले से लेकर मृत्यु होने के एक वर्ष बाद तक संस्कारों की एक लम्बी श्रृंखला यहाँ रही है | इन्हीं स
26 जुलाई 2018
26 जुलाई 2018
*मानव जीवन इतना विचित्र है कि इसमें मनुष्य को अनेक अनुभव होते रहते हैं | मनुष्य की मन:स्थिति ऐसी होती है कि वह क्षण भर दु:खी और दूसरे क्षण सुखी हो जाता है | विचित्र बात यह है कि मनुष्य दु:खी हो जाता है तो सारा दोष दूसरों को या फिर परमात्मा को दे देता है और सुखी होने पर सारा श्रेय स्वयं ले लेता है |
26 जुलाई 2018
22 जुलाई 2018
*मनुष्य का स्वभाव है कि जिस काम को वह एक बार कर लेता है उसी काम को वह पुन: करना चाहता है | जो विचार एक बार उसके मन में आ जाता है वही विचार वह अपने मन में बार - बार लाता रहता है | अपने अनुभवों की आवृत्ति से उसे तृप्ति मिलती है | इस प्रकार जब कोई भाव चित्त में ठहर जाता है और मनुष्य द्वारा उसे बार - ब
22 जुलाई 2018
24 जुलाई 2018
*प्राचीनकाल से ही सनातन धर्म के साधु - संतों , ऋषियों - महर्षियों ने समाज के उत्थान के लिए सदैव प्रयास किया है | इस क्रम में कइयों ने तो स्वयं के प्राणों की आहुति भी दे दी | कुछ लोग समझते हैं कि घर छोड़ कर जंगल में रहने वाला ही साधप हो सकता है | किसी संत या साधु की चर्चा आते ही आँखों के आगे एक गेरुव
24 जुलाई 2018
22 जुलाई 2018
*मानव जीवन बहुत रंग बिरंगा है ! इस जीवन में मनुष्य तरह तरह के व्यवहार इस संसार में करता रहता है | इन्हीं में एक है छल करना या धोखा देना | मनुष्य किसी को धोखे में रखकर बहुत प्रसन्न होता रहता है | जबकि धोखा देने या छल करने वालों का क्या परिणाम होता है इसे लगभग सभी जानते हैं | मनुष्य यह सोंचकर प्रसन्न
22 जुलाई 2018
13 अगस्त 2018
*धरती पर मनुष्य के विकास में मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम प्रमुख था | तब मनुष्य एक ही धर्म जानता था :- "मानव धर्म" | एक दूसरे के सुख - दुख समाज के सभी लोग सहभागिता करते थे | किसी गाँव या कबीले में यदि किसी एक व्यक्ति के यहाँ कोई उत्सव होता था तो वह पूरे गाँ का उत्सव बन जाता था , और यदि किसी के यह
13 अगस्त 2018
22 जुलाई 2018
*मानव जीवन बहुत रंग बिरंगा है ! इस जीवन में मनुष्य तरह तरह के व्यवहार इस संसार में करता रहता है | इन्हीं में एक है छल करना या धोखा देना | मनुष्य किसी को धोखे में रखकर बहुत प्रसन्न होता रहता है | जबकि धोखा देने या छल करने वालों का क्या परिणाम होता है इसे लगभग सभी जानते हैं | मनुष्य यह सोंचकर प्रसन्न
22 जुलाई 2018
26 जुलाई 2018
*धरती पर पुण्यभूमि भारत में जन्म लेने के बाद मनुष्य ने उत्तरोत्तर - निरन्तर विकास करते हुए एक आदर्श प्रस्तुत किया है | आदिकाल से हमारी संस्कृति हमारे संस्कार ही हमारी पहचान रहे हैं | बालक के जन्म लेके के पहले से लेकर मृत्यु होने के एक वर्ष बाद तक संस्कारों की एक लम्बी श्रृंखला यहाँ रही है | इन्हीं स
26 जुलाई 2018
24 जुलाई 2018
*सनातन धर्म के ग्रंथ सदैव हमारे मार्गदर्शक रहे हैं | इन्हीं ग्रंथों में महाराज मनु द्वारा रचित "मनुस्मृति" में धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए धर्म के दस लक्षण बताये हैं | यद्यपि ये दसों लक्षण महत्वपूर्ण है परंतु उसमें से एक विशेष लक्षण है क्षमा | क्षमा मांग लेने या क्षमा कर देने से मानव के जीवन क
24 जुलाई 2018
22 जुलाई 2018
*इस संसार में प्राय: लोगों के मुख से दो शब्द सुनने को मिल जाया करते हैं :- १- त्याग , २- तपस्या | त्याग एक अनोखा शब्द है , त्याग में ही जीवन का सार छुपा हुआ है | त्याग करके ही हमारे महापुरुषों ने जीवनपथ को आलोकित किया है | जिसने भी त्याग की भावना को अपनाया उसने ही जीवन में उच्च से उच्च मानदंड स्थापि
22 जुलाई 2018
24 जुलाई 2018
*सनातन धर्म में प्रभु प्राप्ति के कई साधन बताये गये हैं ! जैसे कि :- जप , तप , पूजा , पाठ , सतसंग आदि | कभी कभी मनुष्य दिग्भ्रमित हो जाता है कि वह प्रभु को प्राप्त करने के लिए कौन सा मार्ग चुने | प्राचीनकाल की कथाओं को पढकर ऐसा लगता है कि सबसे महत्तपूर्ण साधन जप एवं तप ही रहे होंगे | परंतु किसी भी ज
24 जुलाई 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x