वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का महत्त्व

07 अगस्त 2018   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (66 बार पढ़ा जा चुका है)

       वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का महत्त्व

प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि नक्षत्रों को वैदिक ज्योतिष में इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया गया ? जैसा कि हमने पहले भी बताया, नक्षत्र किसी भी ग्रह की गति तथा स्थिति को मापने के लिए एक स्केल अथवा मापक यन्त्र का कार्य करते हैं | यही कारण है कि पञ्चांग (Indian Vedic Ephemeris) के पाँच अंगों में एक प्रमुख अंग नक्षत्र को माना जाता है | पञ्चांग के पाँच अंग हैं – तिथि (चन्द्रमा की गति के अनुसार), वार (सप्ताह का दिन), योग (चन्द्रमा के विविध योग), करण (यह भी चन्द्रमा के ही विविध योग हैं), और नक्षत्र | इस प्रकार नक्षत्र पञ्चांग का एक महत्त्वपूर्ण अंग हो जाता है |

किसी भी माह में आने वाली पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उस माह का नाम उसी नक्षत्र के नाम पर होता है | किसी भी शुभ, माँगलिक अथवा आवश्यक कार्य को करने के लिए जो मुहूर्त अर्थात अनुकूल समय नियत किया जाता है उसकी गणना भी नक्षत्रों के ही आधार पर होती है | विवाह से पूर्व वर वधू की कुण्डलियों का मिलान (Horoscope Matching) भी इन नक्षत्रों के ही आधार पर किया जाता है | यात्रा आरम्भ करने के लिए, कोर्ट में केस फाइल करने के लिए, किसी रोग से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अथवा हमारे दिन प्रतिदिन के अन्य भी अनेक कार्यों में हम इन नक्षत्रों की सहायता लेते हैं | वैदिक परम्परा में तो बच्चे के विद्यारम्भ के लिए भी शुभ मुहूर्त निश्चित किया जाता है जब वह अपने गुरु के समक्ष प्रथम बार उपस्थित होता है | ऐसा माना जाता है कि विपत और वध नक्षत्र में कोई भी आवश्यक अथवा शुभ कार्य नहीं किया जाना चाहिए |

इस समस्त प्रक्रिया का उद्देश्य यही है कि कार्य से सम्बन्धित ग्रह की अनुकूल अथवा प्रतिकूल स्थिति का आकलन कर सकें | जितनी भी ग्रह दशाएँ हैं – चाहे वह विंशोत्तरी दशा हो, अष्टोत्तरी हो, कृष्णमूर्ति हो या कोई भी हो – सभी केवल नक्षत्रों पर ही आधारित हैं | यदि किसी जातक का जन्म क्रूर अथवा अशुभ नक्षत्र में हुआ है अथवा किसी जातक की किसी ऐसे ग्रह की दशा चल रही है जो किसी अशुभ नक्षत्र में स्थित है तो उस व्यक्ति को उस नक्षत्र से सम्बन्धित देवता की पूजा अर्चना तथा दानादि आदि के द्वारा उस नक्षत्र के अशुभ प्रभाव को कम करने का सुझाव दिया जाता है | महाभारत में पूरा का पूरा एक अध्याय ही अशुभ नक्षत्रों का अशुभत्व कम करने के विषय में है | तो नक्षत्रों के महत्त्व को कैसे कम करके आँका जा सकता है ?

वैदिक साहित्य में नक्षत्रों का बड़ा सूक्ष्म विवेचन उपलब्ध होता है क्योंकि उस समय ज्योतिष नक्षत्र प्रधान था | वेदों में नक्षत्रों के उडू, रिक्ष, नभ, रोचना आदि पर्यावाची नाम भी उपलब्ध होते हैं | ऋग्वेद में तो एक स्थान पर सूर्य को भी नक्षत्र की संज्ञा दी गई है | अन्य नक्षत्रों में उस समय सप्तर्षि और अगस्त्य का नाम आता है | नक्षत्रों से सम्बन्धित सूची विशेष रूप से अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, शतपथ ब्राहमण और गणित ज्योतिष के सबसे प्राचीन ग्रन्थ लगध के वेदांग ज्योतिष में उपलब्ध होती है | ऋग्वेद के अनुसार जिस लोक का कभी क्षय नहीं होता उसे नक्षत्र कहा जाता है | तेत्तिरीय संहिता के अनुसार सभी नक्षत्र देव ग्रह हैं और रोचन तथा शोभन हैं और आकाश को अलंकृत करते हैं | इनके मध्य सूक्ष्म जल का समुद्र है, ये उसमें तैरते हैं | इसीलिए सम्भवतः इन्हें तारा अथवा तारक भी कहा जाता है |

“देव ग्रहा: वै नक्षत्राणि य एवं वेद गृही भवति |

रोचन्ते रोचनादिवी सलिलंवोइदमन्तरासीतयदतरस्तंताकानां तारकत्वम् ||

शतपथ ब्राहमण के अनुसार समस्त देवताओं का घर नक्षत्र लोक ही है – नक्षत्राणि वै सर्वेषां देवानां आयतनम् |

ऋग्वेद के दशम मण्डल के पचासीवें सूक्त में कहा गया है कि चन्द्रमा नक्षत्रों के मध्य विचरण करता है, और वहाँ सोमरस विद्यमान रहता है : अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहित: |

इस प्रकार वैदिक साहित्य में नक्षत्रों के विषय में व्यापक चर्चा उपलब्ध होती है | और इसका कारण यही है कि वेदों की प्रवृत्ति यागों के निमित्त हुई और यज्ञ मुहूर्त विशेष की अपेक्षा रखते हैं | मुहूर्त का अत्यन्त सूक्ष्म ज्ञान नक्षत्रों के आधार पर गणना करके ही सम्भव था...

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