कर्म और त्याग

08 अगस्त 2018   |  pradeep   (149 बार पढ़ा जा चुका है)

सनातन धर्म में कर्म और धर्म दोनों की ही व्याख्या की गई है , पर तथाकथित हिन्दू इन दोनों ही शब्दों का अर्थ अपनी सुविधा के अनुकूल प्रयोग करते रहे है. सनातन धर्म की सुंदरता इसमें है कि उसमे सभी विचार समा जाते है. यही कारण है कि लोग बिना मतलब समझे अपनी सुविधा के अनुसार इनका मतलब निकालते है. कर्म एक प्राकृतिक क्रिया है, जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं है. त्याग कर्मो का करना संभव नहीं है, जो सन्यास के नाम पर कर्मो का त्याग करते है वो निश्चय ही पाखंडी है. क्या कोई सन्यासी खाना, पीना ,सांस लेना छोड़ता है? हाँ ऐसे सन्यासी होते है लेकिन उस अवस्था को समाधी कहा जाता है जब कोई खाना, पीना छोड़ कर सांस पर नियंत्रण कर रोक ले और पूर्ण समाधी लेले. क्या आज सन्यास का नाम लेकर अपनी सुविधा के अनुसार जीवन का आनंद नहीं ले रहे?गीता में भगवान कृष्ण ने कर्मो के त्याग को गलत बताते हुए कर्म के फल की इच्छा के त्याग का ज्ञान दिया है. अपने परिवार को छोड़ संन्यास ले लेना केवल कायरता है, अपने कर्मो से भागना है, अपने कर्तव्य या धर्म से भागना है. मैं उन्हे कैसे महान मान लू जो स्वयं भागा हुआ हैं? क्या कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि तू संन्यास ले ले? क्या भगवान् कृष्ण ने उसे ये नहीं कहा था कि यदि तू यह युद्ध क्षेत्र छोड़ कर गया तो लोग तुझे महान नहीं कायर कहेंगे, तेरा अपमान करेंगे. किन्तु आज तथाकथित हिन्दू उन्हें महान बनाने में लगे जो स्वयं अपने कर्मो से अपने कर्तव्यों से भागा हुआ है. समाज सेवा एक ढोंग है, अपने कर्त्वयों से भाग जीवन के आनंद लेने का एक सरल साधन है. देश सेवा से पहले है माँ-बाप, परिवार की सेवा, जो उनकी सेवा ना कर देश की सेवा करे उसे सिर्फ ढोंग ही कहेंगे. देश बदला जा सकता है , परिवार नहीं. अर्जुन का युद्ध राज्य और अपने परिवार का सम्मान पाने के लिए था, फिर भी कृष्ण ने ही नहीं स्वयं धृतराष्ट्र ने इसे धर्म युद्ध बताया. पहले परिवार बनता है फिर परिवारों से समाज और देश बनता है. देश से समाज और परिवार नहीं है, बल्कि परिवार से समाज और समाज से देश है. गीता कोई उपन्यास नहीं कि पढ़ा और फिर सबको गर्व से बताया कि मैंने गीता पढ़ी है, गीता एक ज्ञान का समुन्द्र है जितने गोते लगाओगे उतना ही ज्ञान पाओगे. कर्म का त्याग ना कर उसके फल की इच्छा का त्याग, जिसमे स्वार्थ होता है के त्याग को कृष्ण ने सच्चा त्याग बताया है. (आलिम)

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